Wednesday, December 6, 2017

फसल से अल्पावधि में अधिक मुनाफा और दिसंबर में पशुओं की देखरेख ( More profits in crop in the short term and maintenance of animals in December)

जानें कोन सी फसल अल्पावधि में अधिक मुनाफा देती हैं

      भारत में हर्बल कंपनियों की बढती संख्या बहुत अधिक मात्रा में बढ़ी है साथ ही हर्बल दवाओं, हर्बल कोस्मटिक एवं हर्बल कच्चे सामान की मांग बहुत तेज़ गति से वृधि हुई है पर उसके लिए उपयुक्त कच्चा माल का उत्पादन अभी भी कम हुआ है | आइये आज जानते हैं वोह कोन सी फसलें हैं जो किसानों को कम समय मैं अधिक लाभ दे सकती हैं
      मेडिसिनल प्लांट की फार्मिंग दो तरीके से की जा सकती है। इसमें कुछ ऐसे पेड़ होते हैं जिनके फूलों-फलों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाएँ बनाने में होता है। इसमें आँवला, नीम सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। यह पौधे दीर्घावधि में मुनाफा देते हैं। जबकि अल्पावधि में मुनाफा देने वाले पौधों में ईसबगोल, तुलसी, एलोविरा, हल्दी, अदरक इत्यादि की खेती की जा सकती है। इन सभी उपजों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाएँ बनाने में किया जाता है। इन सभी पौधों की फार्मिंग फसल वर्ष के अनुसार की जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर आप ईसबगोल की फार्मिंग करते हैं तो आपको करीब एक हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी। ईसबगोल की खेती के लिये आपको सिर्फ 20 हजार रुपए का निवेश करना होगा। ईसबगोल की फसल तीन से चार माह में तैयार हो जाती है और इसमें लगभग दो से ढाई लाख रुपए की कमाई हो सकती है। ईसबगोल औषधीय पौधे के रूप में जाना जाता है। इसकी खेती उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड और हरियाणा में की जाती है।
     आमतौर पर इसकी फसल तीन से चार माह में तैयार हो जाती है। एक हेक्टेयर में करीब 15 क्विंटल बीज पैदा हो जाते हैं। ईसबगोल के बीज में करीब 30 फीसद भूसी निकलती है। यही भूसी दवा के रूप में इस्तेमाल की जाती है। अगर थोक में इसकी भूसी बेची जाए तो 40 हजार रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा का भाव मिल सकता है।


अगर आप के पास पशु है तो दिसम्बर माह में क्या करें ?

पशुओं को अन्त: 
          कृमिनाशक दवाई पशु चिकित्सक की सलाह से समय – समय पर पिलायें |पशुओं को संतुलित आहार के साथ – साथ खनिज मिश्रण प्रतिदिन खिलायें |बरसीम अधिक खिलाने से पशुओं को अफारा हो सकता है, अफारे से बचाव के लिए बरसीम के साथ सूखा चारा मिला कर खिलायें |पशुओं को सर्दी से बचाव का उचित प्रबन्ध करें |पशुओं को खुरपका – मुंहपका रोग से बचाव का टीका लगवायें |दुधारू पशुओं को थैनेला रोग से बचाने के लिए पूरा दूध निकाले और दूध दोहन के बाद थनों को कीटाणु नाशक घोल में डुबोयें |बरसीम फसल को सर्दियों में 15 से 20 दिनों के अन्तर पर पानी अवश्य लगायें |जई फसल में पहला पानी 21 – 25 दिनों पर लगायें |
          पशु को आहार देने के कुछ मूल नियम: पशु का आहार संतुलित एवं नियंत्रित हो . उसे दिन में दो बार 8-10 घंटे के अंतराल पर चारा पानी देना चाहिए . इससे पाचन क्रिया ठीक रहती है एवं बीच में जुगाली करने का समय भी मिल जाता है. पशु का आहार सस्ता, साफ़, स्वादिष्ट एवं पाचक हो . चारे में 1/3 भाग हरा चारा एवं 2/3 भाग सूखा चारा होना चाहिए. पशु को जो आहार दिया जाए उसमें विभिन्न प्रकार के चारे-दाने मिले हों. चारे में सूखा एवं सख्त डंठल नहीं हो बल्कि ये भली भांति काटा हुआ एवं मुलायम होना चाहिए. इसी प्रकार जौ,चना, मटर, मक्का इत्यादि दली हुई हो तथा इसे पक्का कर या भिंगो कर एवं फुला कर देना चाहिए. दाने को अचानक नहीं बदलना चाहिए बल्कि इसे धीरे-धीरे एवं थोड़ा-थोड़ा कर बदलना चाहिए. पशु को उसकी आवश्यकतानुसार ही आहार देना चाहिए. कम या ज्यादा नहीं . नांद एकदम साफ होनी चाहिए, नया चारा डालने से पूर्व पहले का जूठन साफ़ कर लेना चाहिए. गायों को 2-2.5 किलोग्राम शुष्क पदार्थ एवं भैंसों को 3.0 किलोग्राम प्रति 100 किलोग्राम वजन भार के हिसाब से देना चाहिए |

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