कम्पोस्ट खाद तैयार करने और मिट्टी की जैविक सामग्री को बेहतर बनाने के लिए जानें आसान तरीका
हमारी मिट्टी की
जैविक सामग्री तेजी से घट रही है। जैविक सामग्री के बिना, खेती संभव नहीं है। केवल यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों जैसे बाह्य आदानों के इस्तेमाल से
ही मदद नहीं मिलेगी।
यहां, हम आपको कम्पोस्ट खाद तैयार करने की एक ऐसी
विधि के बारे में बताएंगे जिसे किसान आसानी से अपनाकर अपनी जमीन की उत्पादकता में
सुधार कर सकता है।
हम सभी जानते हैं
कि मिट्टी में सूक्ष्म जीव/ जीवाणु (बैक्टीरिया) होते हैं, जो कार्बनिक पदार्थों के अपघटन में सहायता करते हैं। यह
सूक्ष्म जीव होते हैं। ये बैक्टीरिया पत्तियों और कूड़े को विघटित करते हैं,
इस प्रकार कार्बनिक पदार्थों को कणों में
परिवर्तित करते हैं, जो मिट्टी की
पोषण सामग्री को बढ़ते हैं। अधिक पोषक तत्वों का अर्थ है उपजाऊ मिट्टी और बेहतर फसल
वृद्धि।
किसी भी औसत कृषि
फार्म में घास, पौधों के झड़े हुए
पत्ते, फ़सली पौधों के ठूंठ,
मवेशियों के मल-मूत्र और फ़सली अवशेषों के रूप
में कार्बनिक पदार्थ होते हैं। इनमें से कुछ कार्बनिक पदार्थ बहुत तेजी से विघटित
होते हैं और खेतों में आसानी से उपलब्ध होते हैं। हालांकि, अन्य को अपघटित होने में अधिक समय लगता है। किसान आम तौर पर
खेत में बचे गन्ने पत्ती/ गेहूं के अवशेषों जैसे कार्बनिक पदार्थों को जलाते हैं।
नतीजतन, इस प्रकार इससे से बड़े
पैमाने पर प्राप्त हो सकने वाला जैविक खाद कचरे के रूप में चला जाता है।
एक एकड़ कृषि
भूमि में उगाए गए गन्ने से 7-8 टन पत्ती का
उत्पादन होता है जो कि बराबर मात्रा में गीला कंपोस्ट पैदा करने में इस्तेमाल की
जा सकती है। यदि यह खाद कृषि भूमि में उपयोग किया जाता है, तो फसलों द्वारा मिट्टी से अवशोषित पोषक तत्वों का हिस्सा
इस कंपोस्ट के मिलने से भरा जा सकता है। यह एक तथ्य है कि गन्ना की पत्ती, गेहूं के पौधों के अवशेष, सूखे पत्ते और फ़सली पौधों के ठूंठ आसानी से
विघटित नहीं होते हैं। लेकिन वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का उपयोग, पोषक तत्व-समृद्ध और कंपोस्ट अपघटन में तेजी के
साथ उत्पादन बढ़ा सकता है।
इसे कैसे बनाएँ?
बैक्टीरिया
कार्बनिक पदार्थों को विघटित करते हैं और उन्हें कंपोस्ट में परिवर्तित करते हैं।
बैक्टीरिया की दक्षता अधिक खाद दर और खाद के उत्पादन को बढ़ाती है। यही कारण है कि
अपघटन के लिए प्रयोगशाला-परीक्षण वाले उच्च दक्षता वाले बैक्टीरिया का प्रयोग करना
सही है। 1 टन कचरे के साथ 1 किलो बैक्टीरिया को मिलाकर उन्हें एक गड्ढे
में डाल दिया जाए। सूक्ष्म जीवों के विकास के लिए जल आवश्यक है। पत्तों और पौधे के
अवशेष जैसे कार्बनिक पदार्थ को जब गड्डे में डाला जाए तो उन पर पानी छिड़का जाना
चाहिए। पानी का छिड़काव पूरी तरह से गड्ढों पर भी करना चाहिए ताकि पत्तियां और
कचरा 60% तक भीगा रहें। हालांकि,
यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि गड्ढे के अंदर जल
भराव नहीं होना चाहिए क्योंकि पनि की कमी या अधिकता अपघटन की दर को कम करती है।
दालों के सूखे
पत्ते दालों की उच्च नाइट्रोजन सामग्री की वजह से अनाज के पत्तों के मुकाबले अधिक
तेजी से विघटित होते हैं। इसी तरह, पौधे के युवा भाग
पुराने भागों की तुलना में जल्द अपघटित होते हैं। इसलिए, सोयाबीन, मूंग, चना, उडद और फ्रांस बीन (सेम) के भूमिगत अपशिष्ट और पत्तियों का उपयोग गन्ने की
पत्ती, गेहूं के पौधों एक अवशेष,
ज्वार और बाजरा के पौधों के अवशेष के साथ गड्ढे
भरने के लिए किया जाना चाहिए जिससे कि अपघटन की प्रक्रिया तेज होती है। कचरे के
छोटे टुकड़े बड़े टुकड़ों की अपेक्षा अधिक तेजी से विघटित होते हैं। इसलिए,
यदि बड़े टुकड़े जिंका सड़ना मुश्किल होता है,
उनको भराई से पहले छोटे टुकड़ों में काटना चाहिए
ताकि कम अवधि में खाद का उत्पादन हो सके। अगर उपलब्ध हो तो पशुओं के गोबर और मूत्र
को खाद के गड्ढे में मिलाया जाना चाहिए।
गन्ने की पत्ती
में नाइट्रोजन सामग्री बहुत अधिक होती है। गेहूं के पौधों के अवशेषों और अन्य
प्रकार के कूड़े के अवशेषों में भी नाइट्रोजन होता है। नाइट्रोजन की अधिक सामग्री
को अपघटन के लिए अधिक समय की आवश्यक होती है। यूरिया जैसे नाइट्रोजन युक्त
रासायनिक उर्वरकों को मिलने से ऐसे कार्बनिक पदार्थों की कार्बन-नाइट्रोजन सामग्री
को कम करने में मदद मिल सकती है। इसलिए, गन्ने की पत्ती और गेहूं के पौधे के अपशिष्ट से खाद तैयार करते समय 1-2 किलोग्राम यूरिया का इस्तेमाल जरूर किया जाना
चाहिए। यूरिया मिलने से कार्बनिक पदार्थ की नाइट्रोजन सामग्री बढ़ जाती है।
कंपोस्ट पिटों को भरने के दौरान, अगर 1-2 किलोग्राम सुपरफास्फेट या 2 किलो रॉक फॉस्फेट प्रति टन जैविक पदार्थ के
साथ उपयोग किया जाता है, तो खाद का
उत्पादन जल्दी किया जा सकता है।
कम्पोस्ट खाद
उत्पादन के दो तरीके हैं
1) ढेर विधि: इस पद्धति में, 2.1 मी x 2.1 मी x 1.5 मीटर के आकार का एक ढेर बनाया जाता है जो ऊपर
को संकु के आकार का होता है। सतह पर चौड़ाई आधार से 0.6 मीटर कम हो जाती है। ढेर विधि में बेल्ट शैली का उपयोग
किया जाता है। शुरुआत में, जैविक पदार्थ की 20 सेमी परत बनाई जाती है। उस पर, नाइट्रोजन युक्त पदार्थ की 10 सेमी मोटी परत रखी जाती है। इसी तरह,
1.5 मीटर की ऊंचाई बनाने के
लिए परतें रखी जाती हैं। प्रत्येक परत पर पानी छिड़का जाता है। पानी के भंडारण के
लिए, सतह को कुछ गहरा किया
जाता है और बाद में पूरे ढेर को मिट्टी और घास के साथ कवर किया जाता है। यह ढेर
में नमी के रखरखाव में मदद करता है। 6-12 सप्ताह की अवधि में, अगर ढेर में
परतों को पलट कर मिश्रित किया जाता है तो अपघटन तेजी से होता है।
2) गड्ढा विधि: इसका उपयोग उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां
कम वर्षा होती है। इस पद्धति में, गड्ढे को ऊंचे
स्थान पर खोदा जाता है। इसकी गहराई 1 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए जबकि चौड़ाई 2-3 मीटर और लंबाई 3.5 मीटर हो। सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक तटबंध को तैयार किया जाना चाहिए।
परिवहन के लिए खाद निकालने में मदद के लिए दो लगातार गड्ढों के बीच काफी दूरी बनाए
रखनी चाहिए। बारिश से सुरक्षा के लिए ऊपर एक शेड बनाया जाना चाहिए। सात दिनों की
अवधि में हर गड्ढे को भरना वांछनीय है। यह जैविक खाद तैयार करने का सबसे अच्छा
तरीका है।
कम्पोस्ट पिटों
को भरने की विधि
कंपोस्ट पिट
(गड्ढे) की चौड़ाई 2.5 मीटर और गहराई 1
मीटर तक होनी चाहिए। आवश्यकता के अनुसार लंबाई 6
मीटर से 10 मीटर तक होनी चाहिए। गन्ने की पत्ती, जैविक पदार्थ और उपलब्ध कचरे को छोटे टुकड़ों में काटा जाना
चाहिए। इन टुकड़ों की 30 सेमी परत गड्ढे
में रखी जानी चाहिए। पानी के एक ड्रम में कचरे के 10% मात्रा के बराबर पशु गोबर मिलाया जाना चाहिए। उच्च प्रतिघटन
क्षमता वाले एक टन बैक्टीरिया को प्रति टन गोबर मिश्रण वाले जैविक पदार्थ में
मिलाया जाना चाहिए। मिलाने के बाद इस मिश्रण को गड्ढे की सभी परतों पर फैलाया जाना
चाहिए। एक किलो यूरिया और 1 किलोग्राम
सुपरफास्फेट प्रति टन कचरे के हिसाब से एक दूसरे पनि के ड्रम में मिलाया जाना
चाहिए। इस घोल को भी समान अनुपात में गड्ढों की परतों पर फैलाना चाहिए। ध्यान रहे
कि बैक्टीरिया को यूरिया और सुपरफोस्फेट घोल के साथ मिश्रित नहीं किया जाना चाहिए।
बैक्टीरिया और गोबर के मिश्रण को परत पर फैलने से पहले यूरिया और सुपरफोस्फेट के
घोल का उपयोग किया जाना चाहिए। आवश्यकता के अनुसार पानी मिलाया जाना चाहिए ताकि
कचरे को 60% पानी के साथ गीला
किया जा सके। इस तरीके से गड्ढे सतह से 30-60 सेमी ऊपर तक भरे जाने चाहिए। पूरे गड्ढे को मिट्टी या गोबर
से ढंकना चाहिए ताकि उसमें निहित पानी के वाष्पीकरण से रोका जा सके। गड्ढे की
सामग्री को एक से डेढ़ महीने के अंतराल पर छाना जाना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो
पानी छिड़का जाए। इस तरीके से, चार महीने में
कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाएगा।
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