Saturday, March 10, 2018

गोभी वर्गीय सब्जियों को नुकसान पहुँचाने वाले 16 प्रमुख कीट व व्याधियेां एवं उनका नियंत्रण ( 16 major pests and diseases affecting cabbage-class vegetables and their control)


गोभी वर्गीय सब्जियों को नुकसान पहुँचाने वाले 16 प्रमुख कीट व व्याधियेां एवं उनका नियंत्रण
16 Major pests and diseases affecting Cole vegetables and their control


मल्टीप्लायर बेसल डोज में 1 किलो एवम पौध रोपड़ के बाद 250 ग्राम 6 दिन के अंतर पर जमीन से देने पर ये सभी समस्याएं बहुत कम आती हैं।
सब्जियों में गोभीवर्गीय सब्जियों का बहुत महत्व है। यह क्रुसीफेरी कुल के अंर्तंगत आती है। गोभीवर्गीय फसल के अन्तर्गत फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठ गोभी, मूली, सरसों आदि आते हैं। इन सब्जियों में कैलिशयम, मेग्नेशियम, फास्फोरस, विटामिन 'ए एवं 'सी इत्यादि भरपुर मात्रा में पाये जाते है।

इसे कर्इ प्रकार के कीट व व्याधियां नुकसान पहुचाते है। एक अनुमान के अनुसार 25-30 प्रतिशत गोभी की फसल कीडों और व्याधियों के प्रकोप से नष्ट हो जाती है। देश के कुल खेती योग्य क्षेत्रफल से सबिजयों का क्षेत्रफल लगभग 3 प्रतिशत है।

जबकि कुल नाशीजीव रसायनो का 15 प्रतिशत प्रयोग सबिजयों पर ही हो रहा है। अत: कीट एंव व्याधियां का प्रभावशाली नियत्रंण जरूरी है। गोभी वर्गीय सबिजयों के कीट एवं व्याधियां का नियंत्रण निम्न प्रकार करें

गोभी वर्गीय सब्जियों को नुकसान पहुँचाने वाले प्रमुख कीट कटुवा सूडी, माहो, हीरक पृष्ठ पतंगा (डाइमंड बैक मौथ), तम्बाकु की इल्ली, अर्धकुंडलक कीट (सेमीलूँपर), गोभी की तितली, सरसों की आरा मक्खी आदि हैं

गोभी वर्गीय सब्जियों को नुकसान पहुँचाने वाली व्याधियों में जड गांठ (रूट नाट), मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्डयू), झुलसा रोग या आल्टनेरिया पानी धब्बा, काला धब्बा (ब्लेक स्पाट), काला सड़न रोग, मुलायम नरम सडन (साफ्ट राट), भूरी गलन या लाल सड़न, आद्र्रगलन रोग, इत्यादि हैं। इस लेख में गोभी वर्गीय सब्जियों के कीट एंव व्याधियां के नियंत्रण का वर्णन किया है।।

गोभी की फसल के प्रमुख कीट एवं नियंत्रण:-

1. गोभी की फसल की कटुवा इल्ली:-
       यह गोभी के छोटे पौधों को रात्रि के समय बहुत नुकसान पहुचाते है। इस कीट की सुंडीयां स्लेटी रंग की चिकनी होती है। व्यस्क शलभ गहरे भूरे रंग के होते है एंव सुंडीयाँ आर्थिक नुकसान पहुँचाती है। इस कीट से लगभग 40 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण:-
       प्रकाश प्रपंच का प्रयोग व्यस्क शलभों को पकडने के लिए करना चाहिए। खेत में जगह-जगह अनुपयोगी पतियों का ढेर लगा कर इनमें शरण ली सूडियों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है।
       खेत के चारों ओर 20-25 से.मी. गहरी चौडी नाली खोद देनी चाहिए ताकी सूंडिया गिरकर एकत्र हो जायेगी और सुबह इन्हे आसानी से नष्ट किया जा सकता है। फोरेट (10 जी) की 10 कि.ग्रा मात्रा प्रति हैक्टेयर के हिसाब से बुवार्इ के साथ प्रयोग करें।

2. गोभी की फसल में माहो : -  
       यह छोटे आकर के हरे पीले पंखदार व पंखविहीन कीट होते है। इस कीट के शिशु एवं व्यस्क दोनों ही पतितयों से रस चूसते है। जिससे पतितयाँ पीली पड़ जाती है। उपज का बाजार मूल्य कम हो जाता है।
       माहो अपने शरीर से मधु रस उत्सर्जित करते है जिस पर काली फफं;दी विकसित हो जाती है जिससे पौधों पर जगह जगह काले धब्बे दिखार्इ देतें है। इस कीट से लगभग 20-25 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण :- 
       परभक्षी कीट लेडी बर्ड बीटल (काक्सीनेला स्पी.) को बढावा दें। मैलाथियान 5 प्रतिशत या कार्बेरिल 10 प्रतिशत चुर्ण का 20 से 25 किलो ग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करे या मिथाइल डिमेटान (25 र्इ.सी.) या डार्इमिथोएट (30 र्इ.सी.) 22.5 मि.ली.  + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से घोल कर छिडकाव करना चाहिए।

3. गोभी की फसल का हीरक पृष्ठ पतंगा (डाइमंड बैक मौथ):-   
       दुनियाभर में इस कीट से गोभीवर्गीय सब्जियों को अत्यधिक नुकसान हो रहा है। इस कीट की इल्लियां पीलापन लिये हुये हरे रंग की और शरीर का अगला भाग भूरे रंग का होता है एवं व्यस्क, घूसर रंग का होता है ।
       जब यह बैठता है तो इसके पृष्ट भाग पर 3 हीरे की तहर चमकीले चिन्ह दिखार्इ देते है। इसी वजह से इसे हीरक पृष्ट पंतगा कहते है। नुकसान पहुँचाने का काम इल्लियां करती है। जो पत्तियों की निचली सतह को खाती है और उनमें छोटे छोटे छिद्र बना देती है। अधिक प्रकोप होने पर छोटे पौधे मर जाते है।

बडे़ पौधो पर फूल छोटे आकार के लगते है। इस कीट से लगभग 50-60 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण :- 
       हीरक पृष्ठ शलभ के रोकथाम के लिये बोल्ड सरसों को गोभी के प्रत्येक 25 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाना चाहिये। डीपेल 8 एल. या पादान (50 र्इ.सी.) का 1000 मि.ली. की दर से प्रति हेक्टेयर छिडकाव करें।

(स्पाइनोशेड़ (25 एस. सी.) 22.5 मि.ली.ली.+ आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से  या थायोडार्इकार्ब 22.5 ग्राम + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से या बेसिलस थूरीजेंसिस कुस्टकी (बी.टी.के.) 30 ग्राम + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से या  500 ग्राम प्रति हैक्टेयर के दो छिड़काव करें। छिडकाव रोपण के 25 दिन व दूसरा इसके 15 दिन बाद करे।)

4. गोभी की फसल की तंबाकु की इल्ली :-  
      इस कीट के पतंगे गहरे भूरे रंग के व आगे के पंखों पर सफेद धारीया होती है। जिसके बीच में काले धब्बे पाये जाते है। यह पतगें रात को बहुत सक्रिय होते है। प्रांरभिक अवस्था में सुंडीयाँ हरे रंग की होती है। जो पत्तों को खुरच कर खाती है। बडी अवस्था में सुडियाँ पत्तों को गोल- गोल काट कर खाती है। 
      गोभी के शीर्षो और गाँठों में यह सुडियाँ ऊपर से घुसकर नुकसान करती है। मादा व्यस्क पतितयों की निचली सतह में समूह मे अण्ड देती है। इस कीट से लगभग 30-40 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण :- 
      अण्डे के समूहों को एकत्र कर नष्ट करना चाहिये। न्यूक्लियर पालीहाइडोसिस वायरस 250 एल. र्इ.हेक्टेयर की छिडकाव करें। मेलाथियान 30 मि.ली.+ आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से या स्पाइानेशेड 25 एस. सी. को 15 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से 10-15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करना चाहिए।

5. गोभी की फसल का अर्धकुंडलक कीट (सेमीलूँपर):- 
      यह बहुभक्षी कीट है यह चलते समय अर्धकुंडलाकार रचना बनाते है। इस कीट की इलिलयां हरे रंग की होती है एवं शरीर पर सफेद रंग की धारियां होती है। इल्लियां पतितयों को खा जाती है परिणाम स्वरूप केवल शिराएँ ही रह जाती है। इस कीट के आक्रमण से लगभग 30-60 प्रतिशत उपज में कमी आ जाती है।

नियंत्रण :-
      प्रारभिक अवस्था में सुडीयाँ समूह में रहती है। अत: इन्हे पतितयो समेत नष्ट कर देना चाहिए। प्रकाश प्रपंच का प्रयोग व्यस्क शलभो को पकडने के लिए करना चाहिए। मेलाथियान (50 र्इ.सी.) को 22.5 मि.ली. + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से  पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

6. गोभी की तितली:-   
      यह मध्यम आकार की पीलापन लिए हुए सफेद रंग की होती है और बाद में वृद्वि होने पर यह हरापन लिए पीले रंग की हो जाती है। तितली की इल्लियां शीर्ष पत्तियों को खाकर नुकसान पहुँचाती है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों की सिर्फ शिराएँ रह जाती है।

नियंत्रण :- 
      प्रतिरोधी किस्मे लगानी चाहिए जैसे बन्दगोभी में र्इ.सी. 24856 एवं सेवाय बेस्ट आल। मेलाथियान (50 र्इ.सी.) को 22.5 मि.ली. + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

7. गोभी की फसल में सरसों की आरा मक्खी :- 
      यह कीट मध्यम आकार की मक्खी की तरह व्यस्क होता हैं इसका शरीर नारंगी, सिर काला व पंख स्लेटी रंग के होते है। मादा अपने आरीनुमा अंड निक्षेपक से पतितयों के किनारे चीर कर अंडे देती है। इस कीट की ग्रब अवस्था हानिकारक होती है।
      भंृगक पतितयाँ खाते हैं और अधिक प्रकोप होने पर सिर्फ शिराएँ रह जाती है। भृंगक फूल के शीर्ष, भीतरी भाग या फिर डंठलों के बीच के भाग को खाकर, उसमें अपशिष्ट पदार्थ छोडने पर जीवाणु आक्रमण करते है।

नियंत्रण :- 
      सुबह के समय इलिलयों को हाथ से पकडकर नष्ट करें। मेलाथियान (50 र्इ.सी.) को 22.5 मि.ली.+ आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

8. गोभी की फसल की प्रमुख व्याधियाँ या रोग एव प्रबंधन:- 
      आद्र गलन रोग :- इस रोग का प्रकोप गोभी में नर्सरी अवस्था में होता है। इसमे जमीन की सतह वाले तने का भाग काला पडकर गल जाता है। और छोटे पोधे गिरकर मरने लगते हैं।

नियंत्रण :- 
      बुआर्इ से पूर्व बीजों को 3 ग्राम थाइरम या 3 ग्राम केप्टान या बाविसिटन प्रति किलों बीज की दर से उपचारित कर बोयें। नर्सरी, आसपास की भूमि से 6 से 8 इंच उठी हुर्इ भूमि में बनावें।
      मृदा उपचार के लिये नर्सरी में बुवार्इ से पूर्व थाइरम या कैप्टान या बाविस्टिन का 0.2 से 0.5 प्रतिषत सांद्रता का घोल मृदा मे सींचा जाता है जिसे ड्रेंचिंग कहते है। रोग के लक्षण प्रकट होने पर बोडों मिश्रण 5:5:50 या कापर आक्सीक्लोराइड 45 ग्राम+ आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से घोल कार छिडकाव करें।

9. भूरी गलन या लाल सड़न :- 
      यह रोग बोरान तत्व की कमी के कारण होता है। गोभी के फूलों पर गोल आकार के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है। और फूल को सडा देते है।

नियंत्रण :- 
      रोपार्इ से पूर्व खेत में 10 से 15 किलो बोरेक्स प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए या फसल पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत बोरेक्स के घोल का छिड़काव करना चाहिए।

10. तना सड़न (स्टाक राट):- 
      रोग की प्रारंभिक अवस्था में दिन के समय पौधे की पतितया लटक जाती है। और रात्रि में पुन: स्वस्थ दिखार्इ देती है। तने के निचले भाग पर मृदा तल के समीप जल सिक्त धब्बे दिखार्इ देते है। धीरे-धीरे रोगग्रसित भाग पर सफेद कवक दिखार्इ देने लगती है व तना सडने लग जाता है। इसे सफेद सड़न भी कहते है।

नियंत्रण :- 
      बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। डायथेन एम-45, 30 ग्राम + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से व बाविस्टिन 15 ग्राम+ आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से  को मिलाकर 15 दिन के अन्तराल पर जब फूल बनना प्रारभ हो 3 छिड़काव करें।

11.काला सड़न रोग:- 
      इस बीमारी के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों के किनारो पर 'वी आकार में हरिमाहीन एवं पानी में भीगे जैसे दिखार्इ देते है। तथा पत्तियों की शिराएँ काली दिखार्इ देती है। उग्रावस्था में यह रोग गोभी के अन्य भागों पर भी दिखार्इ देता है। जिससे फूल के डंठल अन्दर से काले होकर सडनें लगते हैं।

नियंत्रण :- 
      बीजों को बुंवार्इ से पूर्व स्टेप्टोसाइक्लिन 250 मि.ग्रा. या एवं बाविस्टिन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में 2 घंटे उपचारित कर छाया में सुखाकर बुवार्इ करें।
      पौध रोपण से पूर्व जडों को स्टे्रप्टोसाइकिलन एंव बाविसिटन के घोल में 1 घटें तक डूबाकर लगावें तथा फसल में रोग के लक्षण दिखने पर उपरोक्त दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

12. मुलायम/नरम सडन (साफ्ट राट):- 
      यह रोग पौधे की विभिन्न अवस्थाओं में दिखार्इ देता है। यह मुख्य रूप सें काला सड़न रोग के बाद या फूल पर चोट लगने पर अधिक होता है।

नियंत्रण :- 
      रोगग्रसित फूलों को तोडकर नष्ट कर देना चाहिए, स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 200 मि.ग्रा. व कापर आक्सीक्लोराइड 30 ग्राम+ आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर में मिलाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

13. झुलसा रोग या अल्टनेरिया पानी धब्बा रोग :- 
      इस रोग से पत्तियों पर गोल आकार के छोटे से बडे़ भूरे धब्बे बन जाते है। और उनमें छल्लेनुमा धारियाँ बनती है। अन्त में धब्बे काले रंग के हो जाते है।

नियंत्रण :- 
      मेंकोजेब 30 ग्राम प्रति + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे।

14. काला धब्बा (ब्लेक स्पाट):- 
      यह कवक जनित रोग है। प्रारंभ में छोटे काले धब्बे पतितयों पर व तने पर दिखाइ देते है। जो बाद में फूल को भी ग्रसित कर देते है।

नियंत्रण :-  
       डायथेन एम 45 के 3 छिड़काव 30 ग्राम + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर के हिसाब से 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।

15. मृदुरोमिल (डाउनी मिल्डयू):- 
       यह रोग पोधे की सभी अवस्थाओं में आता है व काफी नुकसान करता है। इसमें पत्तियो की निचली सतह पर हल्के बैंगनी से भूरे रंग के धब्बे दिखार्इ देते है।

नियंत्रण :- 
       रिडोमिल एम. जेड.-72 15 ग्राम + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से या डायथेन एम.- 45, 30 ग्राम प्रति + आल क्लियर 3 मीली"+ मल्टीप्लायर 15 ग्राम(फूल आने के बाद स्प्रे में मल्टीप्लायर न उपयोग करें) + स्प्रे प्लस 1 मिली प्रति 15 लीटर की दर से   15 दिन के अंतराल पर  छिडकाव करें।

16. जड गांठ (रूट नाट):- 
       इस रोग से पौधों की जडा़ में गोलकृमि के सक्रंमण से गांठे पड जाती है। जिससे पौधे की वृद्वि रूक जाती हैं पत्तियो पर झुर्रियाँ पड़ जाती है। तथा पत्तियाँ पीली व जडे़ मोटी दिखार्इ देती है। जिससे पौधों पर फल कम संख्या में तथा छोटे लगते है।

नियंत्रण :- 
       मर्इ-जून में खेत की गहरी जुतार्इ कर दें। फसल चक्र अपनाना चाहिए। मेंड़ के चारो तरफ गेंदा के पौधे लगाना चाहिए। बुवार्इ से पूर्व खेत में 25 किवंटल नीम की खाद प्रति हैक्टेयर डालकर मिलाना चाहिए व एल्डीकार्ब 60-65 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से पौधे रोपने के पूर्व खेत में मिला देनी चाहिए।





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