चने की फसल कैसे
उगाऐं
Gram or chick pea crop cultivation
चना रबी ऋतु में
उगायी जाने वाली महत्वपूर्ण दलहन फसल है। चना भारत की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसल
है। चने को दालों का राजा कहा जाता है। पोषक मानक की दृष्टी से चने के 100 ग्राम दाने में औसतन 11 ग्राम पानी, 21.1 ग्राम प्रोटीन, 4.5 ग्रा. वसा,
61.5 ग्रा. कार्बोहाइड्रेट,
149 मिग्रा. कैल्सियम,
7.2 मिग्रा. लोहा,
0.14 मिग्रा. राइबोफ्लेविन
तथा 2.3 मिग्रा. नियासिन पाया
जाता है।
विश्व के कुल चना
उत्पादन का 70 प्रतिशत भारत
में होता है। चने में 21 प्रतिशत प्रोटीन
ए 61.5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट
तथा 4.5 प्रतिशत वसा होती है।
इसमें कैल्शियम आयरन व नियासीन की अच्छी मात्रा होती है। चने का उपयोग इसके दाने व
दाने से बनायी गयी दाल के रुप में खाने के लिये किया जाता है। इसके दानों को पीसकर
बेसन बनाया जाता है, जिससे अनेक
प्रकार के व्यंजन व मिठाईयां बनायी जाती हैं।
हरी अवस्था में
चने के दानों व पौधों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। चने का भूसा चारे व
दाना पशुओं के लिए पोषक आहार के रूप में प्रयोग किया जाता है। चने का उपयोग औषधि
के रूप में जैसे खून साफ करने के लिए व अन्य बीमारियों के लिए भी किया जाता है।
चना दलहनी फसल होने के कारण वातावरण से नाइट्रोजन एकत्र कर भूमि की उर्वरा शक्ति
भी बढ़ाता है।
भारत में चने की
खेती मुख्य रूप से उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा
बिहार में की जाती है। देश के कुल चना क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत भाग तथा कुल उत्पादन का लगभग 92 प्रतिशत इन्ही प्रदेशों से प्राप्त होता है।
भारत में चने की खेती 7.54 मिलियन हेक्टेयर
क्षेत्र में की जाती है जिससे 7.62 क्विं./हे. के
औसत मानक से 5.75 मिलियन टन उपज
प्राप्त होती है।
भारत में सबसे
अधिक चने का क्षेत्रफल एवं उत्पादन वाला राज्य मध्यप्रदेश है तथा छत्तीसगढ़
प्रान्त के मैदानी जिलों में चने की खेती असिंचित अवस्था में की जाती है। राज्यवार
उत्पादन देश में कुल उगायी जाने वाली दलहन फसलों का उत्पादन लगभग 90 लाख टन प्रतिवर्ष होता है।
चने का उत्पादन
कुल दलहन फसलों के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत होता है। देश में चने का सबसे अधिक उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है।
जो कुल चने उत्पादन का 25.3 प्रतिशत पैदा
करता है।
भूमि एवं उसकी
तैयारी :
चने की खेती के
लिए हल्की दोमट या दोमट मिट्टी अच्छी होती है। भूमि में जल निकास की उपयुक्त
व्यवस्था होनी चाहिये। भूमि में अधिक क्षारीयता नहीं होनी चाहिये। प्रथम जुताई
मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्कहैरो से करनी चाहिये। इसके पश्चात् एक क्रास जुताई
हैरों सेकर के पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिये।
चने की प्रमुख
किस्मों की विशेषताएँ यहां प्रस्तुत है:
वैभव- इंदिरा
गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित यह किस्म सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के लिए
उपयुक्त है। यह किस्म 110 – 115 दिन में पकती है। दाना बड़ा, झुर्रीदार तथा कत्थई रंग का होता है। उतेरा के
लिए भी यह उपयुक्त है। अधिक तापमान, सूखाऔर उठका निरोधक किस्म है, जो सामान्यतौर पर
15 क्विंटल तथा देर से बोने
पर 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
उपज देती है।
जेजी-74- यह किस्म 110-115 दिन में तैयार हो जाती है। इस की पैदावार लगभग 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
उज्जैन 21- इसका बीज खुरदरा
होता है। यह जल्दी पकने वाली जाति है जो 115 दिन में तैयार हो जाती है। उपज 8 से 10 क्विंटल प्रति
हेक्टेयर होती है। दाने में 18 प्रतिशत प्रोटीन
होती है।
राधे- यह किस्म 120 - 125 दिन में पककर तैयार होती है। यह 13 से 17 क्विंटल प्रति
हेक्टेयर उपज होती है।
जे. जी. 315-
यह किस्म 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। औसतन उपज 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। बीज का रंग बादामी, देर से बोनी हेतु
उपयुक्त है।
जे. जी. 11-
यह 100 - 110 दिन में पककर तैयार होने वाली नवीन किस्म है। कोणीय आकार
का बढ़ा बीज होता है। औसत उपज 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। रोगरोधी किस्म है
जो सिंचित व असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
जे. जी. 130-
यह 110 दिन में पककर तैयार होने वाली नवीन किस्म है। पौधा हल्के फैलाव वाला, अधिक शाखाएँ, गहरे गुलाबी फूल, हल्का बादामी चिकना है। औसत उपज 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
है।
बी जी-391- यह चने की देशी
बोल्ड दाने वाली किस्म है जो 110-115 दिन में तैयार होती है तथा प्रति हेक्टेयर 14-15 क्विंटल उपज देती है। यह उकठा निरोधक किस्म है।
जे ए के आई-9218- यह भी देशी चने
की बोल्ड दाने की किस्म है। यह 110-115 दिन में तैयार होकर 19-20 क्विंटल प्रति
हेक्टेयर उपज देती है। उकठा रोग प्रतिरोध क किस्म है।विशाल: चने की यह सर्वगुण
सम्पन्न किस्म है जो कि 110 - 115 दिन में तैयार
हो जाती है। इसका दाना पीला, बड़ा एवं
उच्चगुणवत्ता वाला होता है। दानों से सर्वाधिक (80%) दाल प्राप्त होती है।अतः बाजार भाव अधिक मिलता है। इसकी उपज
क्षमता 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
होती है।
काबुली चना काक-2-
यह 120-125 दिनों में पकने वाली किस्म है। इसकी औसत उपज 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह भी उकठा निरोधक किस्म है।
श्वेता
(आई.सी.सी.व्ही.2)- काबुली चने की इस
किस्म का दाना आकर्षक मध्यम आकार का होता है। फसल 85 दिन में तैयार होकर औसतन 13-20 क्विंटल उपज देती है। सूखा और सिंचित क्षेत्रों के लिए
उत्तम किस्म है। छोला अत्यंत स्वादिष्ट तथा फसल शीघ्र तैयार होने के कारण बाजार
भाव अच्छा प्राप्त होता है।
जे जी के-2- यह काबुली चने की
95-110 दिन में तैयार होने वाली
उकठा निरोधक किस्म है जो कि 18-19 क्विंटल प्रति
हेक्टेयर उपज देती है।
मेक्सीकन
बोल्ड- यह सबसे बोल्ड सफेद, चमकदार और आकर्षक चना है। यह 90 - 95 दिन में पककर तैयार हो जाती है। बड़ा और
स्वादिष्ट दाना होने के कारण बाजार भाव सर्वाधिक मिलता है। औसतन 25 - 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।
यह कीट, रोग व सूखा सहनशील किस्म
है।
हरा चना
जे.जी.जी.1- यह किस्म 120 - 125 दिन में पककर तैयार होने वाली हरे चने की किस्म है। औसतन उपज 13 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
हिमा- यह किस्म 135 - 140 दिन में पककर तैयार हो जाती है एवं औसतन 13 से 17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। इस किस्म का बीज छोटा होता है 100 दानों का वजन 15 ग्राम है।
बीज उपचार-
चने में अनेक
प्रकार के कीट एवं बीमारियां हानि पहुँचाते हैं। इनके प्रकोप से फसल को बचाने के
लिए बीज को उपचारित करके ही बुवाई करनी चाहिये। बीज को उपचारित करते समय ध्यान
रखना चाहिये कि सर्वप्रथम उसे फफूंदनाशी फिर कीटनाशी तथा अन्त में राजोबियम कल्चर
से उपचारित करें।
जड़ गलन व उखटा
रोग की रोकथाम के लिए बीज को कार्बेन्डाजिम या मैन्कोजेब या थाइरम की 1.5 से 2 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति कि.ग्रा. बीजदर से उपचारित करें। दीमक एवं अन्य
भूमिगत कीटों की रोकथाम हेतु क्लोरोपाइरीफोस 20 ईसी या एन्डोसल्फॅान 35 ईसी की 8 मिलीलीटर मात्रा
प्रति किलो बीजदर से उपचारित कर के बुवाई करनी चाहिये।
बोने का समय एवं बुवाई-
असिचिंत
क्षेत्रों में चने की बुवाई अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े में कर देनी चाहिये। जिन
क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा हो वहां पर बुवाई 30 अक्टूबर तक अवश्य कर देनी चाहिये। फसल से अधिक पैदावार
प्राप्त करने के लिए खेत में प्रति इकाई पौधों की उचित संख्या होना बहुत आवश्यक
है।
पौधों की उचित
संख्या के लिए आवश्यक बीज दर व पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की उचित दूरी की
महत्वपूर्ण भूमिका होती है बारानी खेती के लिए 80 कि.ग्रा. तथा सिंचित क्षेत्र के लिए 60 कि.ग्रा. बीज की मात्रा प्रति हैक्टेयर
पर्याप्त होती है।
बारानी फसल के
लिए बीज की गहराई 7 से 10 से.मी. तथा सिंचित क्षेत्र के लिए बीज की
बुवाई 5 से 7 से.मी. गहराई पर करनी चाहिये।
फसल की बुवाई-
पंक्ति से पंक्ति
की दूरी 45 से 50 से.मी. पर करनी चाहिये। चने की बुआई समय पर
करने से फसल की वृद्धि अच्छी होती है साथ ही कीट एवं बीमारियों से फसल की रक्षा
होती है, फलस्वरूप उपज अच्छी मिलती
है। अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि 20 से 30 अक्टूबर तक चने की बुवाई
करने से सर्वाधिक उपज प्राप्त होती है। असिंचित क्षेत्रों में अगेती बुआई सितम्बर
के अन्तिम सप्ताह से अक्टूबर के तृतीय सप्ताह तक करनी चाहिए।
सामान्य तौर पर
अक्टूबर अंत से नवम्बर का पहला पखवाड़ा बोआई के लिए सर्वोत्तम रहता है। सिंचित
क्षेत्रों में पछेती बोआई दिसम्बर के तीसरे सप्ताह तक संपन्न कर लेनी चाहिए। उतेरा
पद्धति से बोने हेतु अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा उपयुक्त पाया गया है। धान कटाई के
बाद दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक चने की बोआई की जा सकती है, जिसके लिए जे. जी. 75, जे. जी. 315, भारती, विजय, अन्नागिरी आदि उपयुक्त किस्में हैं।
बूट हेतु चने की
बोआई सितम्बर माह के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह तक की जाती
है।बूट हेतु चने की बड़े दाने वाली किस्में जैसे वैभव, पूसा 256, पूसा 391,
विश्वास, विशाल, जे.जी. 11 आदि लगाना चाहिए।
सिंचाई-
आमतौर पर चने की
खेती असिंचित अवस्था में की जाती है। चने की फसल के लिए कम जल की आवश्यकता होती
है। चने में जल उपलब्धता के आधार पहली सिंचाई फूल आने के पूर्व अर्थात बोने के 45 दिन बाद एवं दूसरी सिंचाई दाना भरने की अवस्था
पर अर्थात बोने के 75 दिन बाद करना
चाहिए।
खाद एवं उर्वरक-
चना, हरभरा.
चने की फसल का
मल्टीप्लायर के साथ नियोजन.
फसल लगाते समय १
किलो मल्टीप्लायर जमीन से देना है, उसके बाद जब भी
पानी दें १ किलो मल्टीप्लायर देना है, देने की विधि अलग से बताई गई है.
छिड़काव से फसल पर
ज्यादा अच्छा और तुरंत परिणाम मिलता है, इसलिए जमीन से देने के साथ-साथ प्रति सप्ताह १५ लीटर पानी में १५ ग्राम
मल्टीप्लायर + २ मिली ऑल क्लियर मिलाकर छिड़काव करें, इसमें आवश्यकतानुसार रासायनिक दवाइयां भी मिलाई जा सकती
हैं.
रासायनिक खाद
एकदम से बंद नहीं करना है, उसका प्रमाण २०
प्रतिसत कम करिये, जब आपको उत्पादन
बढ़कर मिले, तब अगली फसल में रासायनिक
खाद और कम करिये, बढ़ते उत्पादन के
साथ रासायनिक खाद कम होते-होते कुछ सालों में आपका रासायनिक खाद शून्य हो जायेगा.
चने की फसल में
मल्टीप्लायर देने से फसल की ग्रोथ जबरदस्त होती है, शाखाओं की संख्या बढ़ती है, शाखा की प्रत्येक पत्ती के पास फूल लगता है, कई किसान भाइयों ने मल्टीप्लायर का इस्तेमाल
करके डबल से ज्यादा उत्पादन लिया है.
मल्टीप्लायर का
इस्तेमाल होने से खर्च में बचत होती है तथा उत्पादन बढ़कर मिलता है.
उर्वरकों का
उपयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही किया जाना चाहिए। चना के पौधों की जड़ों में
पायी जाने वाली ग्रंथियों में नत्रजन स्थिरीकरण जीवाणु पाये जाते हैं जो वायुमण्डल
से नत्रजन अवषोषित कर लेते है तथा इस नत्रजन का उपयोग पौधे अपनी वृद्धि हेतु करते
हैं।
अच्छी उपज
प्राप्त करने के लिए 20-25 किलोग्राम
नत्रजन 50-60 किलोग्राम
फास्फोरस 20 किलोग्राम पोटाष व 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग
करे। वैज्ञानिक द्वारा शोध से पता चला है कि असिंचित अवस्था में 2 प्रतिषत यूरिया या डी.ए.पी. का फसल पर स्प्रे
करने से चना की उपज में वृद्धि होती है।
खरपतवारों-
खरपतवारों द्वारा
होने वाली हानि को रोकने के लिए समय पर नियंत्रण करना बहुत आवश्यक है। चने की फसल
में दो बार गुड़ाई करना पर्याप्त होता है। प्रथम गुड़ाई फसल बुवाई के 30-35 दिन पश्चात् व दूसरी 50-55 दिनों बाद करनी चाहिये। यदि मजदूरों की
उपलब्धता न हो तो फसल बुवाई के तुरन्त पश्चात् पैन्ड़ीमैथालीन की 2.50 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत में समान रूप से मशीन द्वारा
छिड़काव करना चाहिये।
फिर बुवाई के 30-35 दिनों बाद एक गुड़ाई कर देनी चाहिये। इस प्रकार
चने की फसल में खरपतवारों द्वारा होने वाली हानि की रोकथाम की जा सकती है। कीट एवं
बीमारी नियंन्त्रण चने की फसल में अनेक प्रकार के कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप
होता है जिनका उचित समय पर नियंत्रण करना बहुत आवश्यक है।
दीमक, कटवर्म -
यदि बुवाई से
पहले एन्डोसल्फॅान क्यूनालफोस या क्लोरोपाइरीफोस से भूमि को उपचारित किया गया है
तथा बीज को क्लोरोपाइरीफोस कीटनाशी द्वारा उपचारित किया गया है तो भूमिगत कीटों
द्वारा होने वाली हानि की रोकथाम की जा सकती है। यदि खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप
होतो क्लोरोपाइरीफोस 20 ईसी या
एन्डोसल्फान 35 ईसी की 2 से 3 लीटर मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के साथ देनी चाहिये।
ध्यान रहे दीमक
के नियन्त्रण हेतु कीटनाशी का जड़ों तक पहुँचना बहुत आवश्यक है। कटवर्म की लटें
ढेलों के नीचे छिपी होती है तथा रात में पौधों को जड़ों के पास काटकर फसल को नुकसान
पहुँचाती हैं। कटवर्म के नियंत्रण हेतु मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत या क्यूनालफोस 1.50 प्रतिशत या एन्डोसल्फॉन् 4 प्रतिशत चूर्ण की 25 किलोग्राम मात्रा को प्रतिहैक्टेयर की दर से भुरकाव शाम के
समय करना चाहिये। ट्राईक्लोरोफॉन 5 प्रतिशत चूर्ण
की 25 कि.ग्रा. मात्रा को भी
प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव किया जा सकता है।
फली छेदक -
यह कीट
प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियों को खाकर फसल को हानि पहुँचाता है। फली आने पर
उसमें छेद बनाकर अन्दर घुस जाता है तथा दाने को खाकर फली को खोखला बना देता है। इस
कीट के नियंत्रण हेतु फसल में फूल आने से पहले तथा फली लगने के बाद एन्डोसल्फॉन 4 प्रतिशत या क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियोन 2 प्रतिशत चूर्ण की 20-25 कि.ग्रा. मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकनी
चाहिये।
पानी की उपलब्धता
होने पर मोनोक्रोटोफॉस 35 ईसी या
क्यूनॉलफोस 25 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से फसल में
फूल आने के समय छिड़काव करना चाहिये।
झुलसा रोग
(ब्लाइट)-
यह बीमारी एक
फफूंद के कारण होती है। इस बीमारी के कारण पौधें की जड़ों को छोड़कर तने पत्तियों
एवं फलियों पर छोटे गोल तथा भूरे रंग के धब्बे बन जाते है। पौधे की आरम्भिक अवस्था
में जमीन के पास तने पर इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। पहले प्रभावित
पौधे पीले व फिर भूरे रंग के हो जाते हैं तथा अन्ततः पौधा सूखकर मर जाता है।
इस रोग के लक्षण
दिखाई देने पर मैन्कोजेब नामक फफूंदनाशी की एक कि.ग्रा. या घुलनशील गन्धक की एक
कि.ग्रा. या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 1.30 कि.ग्रा.मात्रा को 500 लीटर पानी में
घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये। 10 दिनों के अन्तर
पर 3-4 छिड़काव करने पर्याप्त
होते हैं।
उखटा रोग
(विल्ट)-
इस बीमारी के
लक्षण जल्दी बुवाई की गयी फसल में बुवाई के 20-25 दिनों बाद स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। देरी से बोई
गयी फसल में रोग के लक्षण फरवरी व मार्च में दिखाई देते हैं। पहले प्रभावित पौधे
पीले रंग के हो जाते हैं तथा नीचे से ऊपर की ओर पत्तियाँ सूखने लगती हैं अन्ततः
पौधा सूखकर मर जाता है।
इस रोग के
नियन्त्रण हेतु भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिये। यदि सिंचाई की सुविधा
उपलब्ध होतो बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही सिंचाई कर देनी चाहिये। रोगरोधी
किस्मों जैसे आर एस जी 888 ए सी 235 तथा बीजी 256 की बुवाई करनी चाहिये।
किट्ट (रस्ट)-
इस बीमारी के
लक्षण फरवरी व मार्च में दिखाई देते हैं। पत्तियों की ऊपरी सतह पर फलियों
पर्णवृतों तथा टहनियों पर हल्के भूरे काले रंग के उभरे हुए चकत्ते बन जाते हैं। इस
रोग के लक्षण दिखाई देने पर मेन्कोजेब नामक फफूंदनाशी की एक कि.ग्रा. या घुलनशील
गन्धक की एक कि.ग्रा. या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 1.30 कि.ग्रा. मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये। 10 दिनों के अन्तर पर 3-4 छिड़काव करने पर्याप्त होते हैं।
पाले से फसल का
बचाव चने की फसल में पाले के प्रभाव के कारण काफी क्षति हो जाती है। पाले के पड़ने
की संम्भावना दिसम्बर-जनवरी में अधिक होती है। पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के
लिए फसल में गन्धक के तेजाब की 0 .1 प्रतिशत मात्रा
या एक लीटर गन्धक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में
घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये। पाला पड़ने की सम्भावना होने पर खेत के चारों और
धुआं करना भी लाभदायक रहता है।
फसल चक्र भूमि की
उर्वरा शक्ति बनाये रखने एवं फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए उचित
फसलचक्र की विशेष भूमिका होती है। असिंचित क्षेत्र में पड़त-चना (एकवर्षीय),
पड़त-चना-पड़त-सरसों (द्विवर्षीय), तथा पड़त-चना-पड़त-सरसों-पड़त-चना (तीनवर्षीय) फसल
चक्र अपनाये जा सकते हैं।
फसल की कटाई एवं
गहाई -
फसल जब अच्छी
प्रकार से पक जाये तो कटाई करनी चाहिये। जब पत्तियाँ व फलियाँ पीली व भूरे रंग की
हो जाएं तथा पत्तियाँ गिरने लगे एवं दाने सख्त हो जाये तो फसल की कटाई कर लेनी
चाहिये। कटाई की गई फसल जब अच्छी प्रकार सूख जाये तो थ्रैशर द्वारा दाने को भूसे
से अलग कर लेना चाहिये तथा अच्छी प्रकार सुखाकर सुरक्षित स्थान पर भण्डारित कर
लेना चाहिये।
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