दुधारू पशु खरीदते समय ध्यान देने योग्य बातें
दुधारू पशु का मूल्याकंन उनके दुग्ध उत्पादन क्षमता, प्रतिवर्ष बच्चे देने की क्षमता तथा लम्बे, स्वास्थ्य एवं उपयोगी जीवन से किया जाता है। अच्छे दुधारू पशुओं को खरीदते समय किसान भाइयों को निम्नलिखित गुणों पर ध्यान दिया जाना चाहिये
शारीरिक संरचना
दुधारू पशुओं का शरीर आगे से पतला तथा पीछे से चौड़ा, नथुना खुला हुआ, जबड़ा मजबूत पेशीवाला, आँखे उभरी एवं चमकदार, त्वचा पतली, पूँछ लम्बी, सींगों की बनावट नस्ल के अनुसार, कन्धा शरीर से भली-भाँति जुड़ा हुआ, छाती का भाग विकसित, पीठ चौड़ी एवं समतल तथा शरीर छरहरा होना चाहिये दुधारू गाय की जाँघ पतली एवं गर्दन पतली लम्बी एवं सुस्पष्ट होनी चाहिये। पेट काफी विकसित होना चाहिये। अयन (थन) की बनावट समितीय, त्वचा कोमल होना चाहिये। चारों चूचक एक समान लबें एवं मोटे, एक दूसरे से समान दूरी होना चाहिये।
दुग्ध उम्पादन क्षमता
खरीदने से पूर्व उसे स्वंय दो तीन दिन तक दुहकर भली-भाँति परख लेना चाहिये। दूहते समय दूग्ध की धार सीधी गिरनी चाहिये तथा दूहने के बाद थन सिकुड़ जाना चाहिये। अयन में दूध की शिराएँ उभरी हुई अच्छी तरह से विकसित दिखाई देनी चाहिये।
वंशावली
यदि पशु की वंशावली उपलब्ध हो तो उनके बारे में सभी बातों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन हमारे यहाँ वंशावली रिकॉर्ड रखने का प्रचलन नहीं है, जिसके कारण अनेक लक्षणों के आधार पर ही पशु का चुनाव करना पड़ता है। अच्छे डेरी फार्म से पशु खरीदने में यह सुविधा प्राप्त हो सकती है।
आयु
सामान्यतः पशुओं की जनन क्षमता 10-12 वर्ष की आयु के बाद समाप्त हो जाती है। तीसरे-चौथे ब्याँत तक दुग्ध उत्पादन चरम सीमा पर रहता है जो धीरे-धीरेे घटते जाता है। अतः दुग्ध उत्पादन व्यवसाय के लिये 2-3 दाँत वाले कम आयु के पशु अधिक लाभदायक होते हैं। दुधारू पशुओं में स्थाई एवं अस्थाई दो प्रकार के होते है। स्थाई दाँत मटमैले सफेद रंग के उपर से नीचे की तरफ पतले गर्दन का आकार लिये हुए जबड़े से जुड़े होते हैं जबकि अस्थाई दाँत सफेद बिना गर्दन के जबड़े से लगे होते हैं। 6 (छः) साल के बाद मवेशियों के सामने के दो( इनसाइजर) दाॅत धीरे-धीरे घिसनें लगते हैं जिससे अपेक्षाकृत कम नुकीले एवं छोटे दिखाई देते हैं। 10-11 साल की आयु होने तक चारों इनसाइजर दाँत घिसकर छोटे हो जाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ-साथ लगभग सभी दाँत घिसकर चौकोर हो जाते हैं तथा दो दाँतों के बीच में फर्क दिखाई देने लगता है।
स्वास्थ्य एवं जनन क्षमता
पशु का स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिये तथा स्वास्थ्य के बारे में अगल-बगल के पड़ोसी से जानकारी भी अवश्य लेनी चाहिये। टीकाकरण एवं अब तक हुई बीमारियों के बारे में सही-सही जानकारी होने से उसके उत्तम स्वास्थ्य पर भरोसा किया जा सकता है।
आदर्श दुधारू गाय वही होती है जो प्रतिवर्ष एक बच्चा देती है। पशु क्रय करते समय उसका प्रजनन इतिहास अच्छी तरह जान लेना चाहिये। यदि उसमें किसी प्रकार की कमी हो तो उसे कदापि नहीं खरीदना चाहिये। क्योंकि ये कभी भविष्य में समय पर पाल न खाने, गर्भपात होने, स्वास्थ्य, बच्चा नही होने, प्रसव में कठिनाई होने इत्यादि कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
गौ-संवर्धन योजना से किसान बना धनवान (उदाहरण)
झाबुआ जिले के रामा ब्लाक का किसान वरदीचंद पंचाल, पशुपालन विभाग की आचार्य विद्यासागर गौ-संवर्धन योजना से लाभ लेकर अब सामान्य किसान से धनवान किसान की श्रेणी में आ गया है। वरदीचंद कल तक अपने खेती जमीन से फसल उत्पादन कर मात्र 10 हजार रुपये सलाना कमाकर सामान्य जीवन बिता रहे थे। इन्हें पशुपालन विभाग की वैज्ञानिक संगोष्ठी में परिचर्चा में हिस्सा लेने पर पता चला कि फसल उत्पादन के साथ पशुपालन का व्यवसाय आसानी से किया जा सकता है।वरदीचंद ने पशुपालन विभाग में आचार्य विद्या सागर गौ-संवर्धन योजना में आवेदन प्रस्तुत किया। कुछ समय बाद ही बैंक ऑफ बडौदा की पारा शाखा से इन्हें 6.90 लाख रुपये का लोन मंजूर हुआ और 1.50 लाख रुपए अनुदान भी मिला। इस राशि से वरदीचंद ने गुजरात के कच्छ एंव भुज क्षेत्र से 10 दुधारू मुर्रा भैंसे खरीदी, खेत में हरा-चारा का उत्पादन शुरू किया और फसल से निकलने वाले भूसे एवं अन्य फसल अपशिष्टों का भी भैंसों के आहार के रूप में उपयोग किया।
वरदीचंद को अब भैंसो से रोजाना 70 लीटर दूध मिलता है जिसे वे सहकारी दुग्ध संघ में बेचकर 42 हजार रुपये प्रति माह कमाते हैं। साथ ही प्रति-माह 15 हजार रुपये बैंक ऋण की किश्त भी जमा करते हैं।
दुधारू भैंसो ने वरदीचंद की किस्मत बदल दी है। यह किसान अब दुधारू भैंसो की संख्या बढ़ाकर बड़े स्तर पर डेयरी फार्म एवं वृहद स्तर पर दुग्ध उत्पादन का काम करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। यह किसान अपने आस-पास के किसानों को पशुपालन की जानकारी देकर उन्नत किसान बनने की प्रेरणा भी दे रहा है।
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