Thursday, January 18, 2018

जानवरों से फसलों को बचाएगा यह यंत्र.... ( This machine will save crops from animals ....)

जानवरों से फसलों को बचाएगा यह यंत्र....

    किसानों के लिए जंगली जानवर जैसे कि हाथी, नीलगाय और जंगली सुअर आदि अक्सर परेशानी का सबब बने रहते हैं। ये जानवर फसलों को नुकसान पहुंचाने के साथ साथ कई बार इंसानों के लिए भी खतरा बन जाते हैं।

इन जानवरों की समस्या से निपटने के लिए किसानों द्वारा परंपरागत तकनीकों का सहारा लिया जाता रहा है, लेकिन अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास के द रूरल टेक्नोलॉजी एक्शन ग्रुप फॉर तमिलनाडु के शोधकर्ताओं ने एक ऐसे संवेदी यंत्र को विकसित किया है, जो अलार्म एवं रोशनी के जरिये खेत में जानवरों की मौजूदगी की सूचना देकर किसानों को सतर्क कर सकता है। डाउन टू अर्थ पोर्टल पर प्रकाशित समाचार के अनुसार इस उपकरण को दो छात्रों रवि खत्री और एस. सरथ ने मिलकर तैयार किया है।

इस यंत्र में दो सेंसर लगाए गए हैं, जिनमें से एक पैसिव इन्फ्रार-रेड सेंसर और दूसरा माइक्रोवेव सेंसर है। इसके अलावा एक अलार्म और प्रकाशीय युक्ति भी इसमें जोड़ी गई है। इस उपकरण को खेत में दस मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। जैसे ही कोई जानवर इसके करीब आता है तो इसमें लगे सेंसर उसकी उपस्थिति को भांप लेते हैं और उपकरण में लगी लाईटें जलने लगती हैं तथा अलार्म बजने लगता है। अलार्म की आवाज और लाईटों को देखकर जानवर दूर भाग जाते हैं। इससे किसान को भी पता चल जाता है कि उनके खेत में कोई जानवर घुस आया है।

ग्रामीण प्रौद्योगिकी केंद्र के प्रोफेसर अभिजीत पी. देशपांडे के अनुसार ‘‘यह उपकरण इस प्रकार विकसित किया गया है कि एक फसल लेने के बाद जब खेत खाली हो तो इसे आसानी से निकालकर रखा जा सके। जब किसान दोबारा फसल उगाएं तो इस उपकरण को फिर से खेत में लगा सकते हैं।

इस परियोजना से जुड़ी संध्या सीतारमन ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि अभी इस उपकरण को बैटरी से चलाया जाता है, लेकिन भविष्य में इसे सौर ऊर्जा की मदद से चलाने की संभावना को तलाशा जा रहा है। इसके अलावा इस उपकरण की लागत को कम करने के भी प्रयास किए गए हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान इस उपकरण का फायदा उठा सकें।


प्रोफेसर देशपांडे के अनुसार इस उपकरण को खेत में लगाने के लिए करीब दो हजार रुपये लागत आती है। इसका रखरखाव आसान है और कोई जानवर इसे नुकसान भी नहीं पहुंचाता। फिलहाल इस यंत्र को खेत में पांच से दस मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इस दूरी को बढ़ाए जाने की कोशिश भी की जा रही है।



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