Watermelon, तरबूज
मल्टीप्लायर : तरबूज तथा
खरबूज की फसल के लिए मल्टीप्लायर का नियोजन.
सबसे पहले बीज प्रक्रिया
करें, १ किलो बीज में ५ ग्राम
मल्टीप्लायर तथा थोड़ा पानी मिलाकर बीज प्रक्रिया की जा सकती है, बीज प्रक्रिया करने का तरीका अलग से बताया गया
है.
तरबूज तथा खरबूज की फसल
में किटक तथा रोग अधिक आते है, इसलिए आज का काम कल पर ना
टालें, जैसे ही दो पत्ते दिखने
लगें १५ लीटर पानी में १० ग्राम मल्टीप्लायर तथा ५ मिली ऑल क्लियर मिलाकर छिड़काव
करना है, इस प्रकार अगले एक महीने
तक प्रत्येक ४ दिन के अंतर से मल्टीप्लायर तथा ऑल क्लियर का छिड़काव करना है,
इस छिड़काव के बावजूद अगर पत्तों पर किड रोग आता
है, तब जरुरत के मुताबिक किटक
नाशक भी मिला सकते हैं.
फसल को एक किलो
मल्टीप्लायर जमीन से देना है, इसका तरीका अलग से बताया
है, एक महीने के बाद फिर से
एक किलो मल्टीप्लायर जमीन से देना है.
रासायनिक खाद अगर आप
हमेशा देते हैं तब दीजिये उसका प्रमाण २० प्रतिसत कम करिये, जब आपको उत्पादन बढ़कर मिले तब अगली फसल में रासायनिक खाद और
कम करिये, कुछ सालों में आपका
रासायनिक खाद शून्य हो जायेगा.
फसल एक महीने की हो जाने
के बाद आठ दिन के अंतर से १५ लीटर पानी में १० ग्राम मल्टीप्लायर + २ मिली ऑल
क्लियर का छिड़काव उत्पादन निकलने तक करना है, आवश्यकतानुसार किटक नाशक मिला सकते हैं, इस प्रकार के नियोजन से किटक तथा रोग कम से कम
आएंगे.
तरबूज तथा खरबूज कि फसल
में मर रोग का प्रॉब्लेम आता है, इसलिए फसल लगाने के १० या
१५ दिन बाद कंपनी के बताए अनुसार खेत में ट्रायकोडर्मा बनाकर ट्रीटमेंट करें,
ऐसा करने से आपकी फसल में मर रोग नहीं आएगा,
ट्रायकोडर्मा ट्रीटमेंट का ५ एकड़ का खर्च २५०
रुपये आता है.
उपरोक्त नियोजन से
रासायनिक खेती के मुकाबले खर्च कम आएगा, अचानक आनेवाले मर रोग से मुक्ति मिलेगी, जहरीली दवाओं पर होनेवाले खर्च में बचत होगी, उत्पादन बढ़कर मिलेगा, स्वाद तथा कलर अप्रतिम होने से भाव ज्यादा मिलेगा, मल्टीप्लायर का इस्तेमाल करने के कारण फसल को
बढ़ाने के लिए, पत्तों को गहरे हरे रंग
का बनाने के लिए, दूसरे किसी उत्पादन की
आवश्यकता नहीं पड़ती.
फसल चक्र
जहा जल भराव की समस्या हो
ऐसे क्षेत्र मे फसल को धान के साथ फसलचक्र अपनाये जिससे मृदुल व चूर्णिल आसिता रोग
का प्रकोप कम होता है।
बुवाई तकनीक
भूमि की तैयारी
अच्छे विकास हेतु 15 टन गोबरखाद / एकड़ के हिसाब से डालें। भूमि मे 2 से 3 जुताई कर, समतल बनाकर 1.5 से 2 मी के अंतर पर कतार बनाए।
बुवाई पूर्व ट्राइकोडर्मा
विरडी 250 ग्राम 10 किलो गोबर खाद मे मिलाकर फसल के विकास की
शुरुआत की अवस्था मे कतारो मे देने से मृदाजन्य फफूंद से होने वाले सुखारा रोग से
बचा सकते है।
किस्में
प्रमुख किस्मे है
-माधुरी 64, मधुबाला 80, रोजा, रेडस्टार, आयशा, पाकीजा (नुनहेम्स सीड्स)
-एनएस-295, 246,
450, 1004, 296, तेजस्व (नामधारी सीड्स)
-अपूर्वा, ब्लेक मेजिक, शुगर पेक, ब्लेक बॉय (सेमिनिस
वेजीटेबल्स)
-सुगरकिंग, सुपर ड्रेगॉन, अगस्टा, बादशाह (सिंजेन्टा)
-555, 316, चैम्पियन, सितारा (सनग्रो)
-सुचित्रा, संतृप्ति, अमृत, अमल (महिको सीड्स)
-जेके लेखा, जेके 9, डब्लू07 (जे के एग्री जेनेटिक्स)
बीज उपचार
बीज की परत नरम बनाने व
अच्छे अंकुरण हेतु बीज को बुवाई से पहले गरम पानी में 30 मिनिट डुबोए जिससे सुषुप्तवस्था दूर होगी।
प्रारंभ मे ज़मीन,
बीज जन्य रोग से बचने के लिए बुवाई से पहले
कार्बेण्डाजिम 50WP @ 3gm /किलो बीज के हिसाब से
उपचारित करें।
बुवाई तकनीक
खरीफ फसल के अच्छे विकास
हेतु, बुवाई जून - जुलाईमें 2-2.5
m x 1-1.5 मीटर के अंतर पे करें।
ग्रीष्मकालीन फसल की
बुवाई जनवरी या फरवरी में करें।
अच्छे विकास हेतु अंकुरण
के 8-10 दिन बाद 1 जगह पर 1 स्वस्थ पौधा रखे, बाकी के पौधे निकाल दे,पौधे का विकास नाली के 1 तरफ होने दे
खरपतवार नियंत्रण
खरपतवार के प्रभावी
नियंत्रण हेतु बुवाई के तुरंत बाद पेन्डीमीथेलीन 30EC (स्टोम्प, टाटपेनिडा) @1.3 लीटर / एकड़ / 200 लीटर पानीमे मिलाकर छिड़के।
निराई गुड़ाई
बीज अंकुरण के 10
- 12 दिनो के बाद एक निराई
गुड़ाई करे, फूल आने से पहले 2 से 3 निराई गुडाई ज़रूरी है।
पोषण व्यवस्था
सिचाई
सिंचाई समयसारिणी
सर्दी के मौसम में 15 से 20 दिन के अंतर पर पानी दें, गर्मियों में पानी की कमी
न होने दें।
सूक्ष्मसिंचाई
अच्छे विकास हेतु टपक
सिंचाई में 1-2 लीटर/ दिन / पौधे के हिसाब से और परम्परागत सिंचाई के
लिए 3 - 6 लीटर/ दिन/ पौधे हिसाब से पानी दे।
परम्परागत सिंचाई की
अपेक्षा मल्चिंग के साथ बूंद - बूंद सिंचाई से 18% तक उत्पादन वृद्धि तथा 40% तक पानी की बचत संभव।
कटाई व बाद की क्रियाएँ
कटाई की तकनीक व सही समय
बुवाईके दो से ढाई महीने
मे पहली तुड़ाई होती है। तुड़ाई 2-4 दिन के अंतर पर सुबह या
शाम को करे। तोड़े हुये फल को छांव में रखें। कटाई के सही समय की पहचान इस प्रकार
है। 1. तने के तंतु सूखते है। 2.
फल के नीचे पीला धब्बा होता है, शुरू में ये हरा होता है फिर पकाने के समय यह
धब्बा पीला होता है। 3. पकने के समय फल को हाथ
ठोकने पर धातु जैसे आवाज आती है।
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