Sunday, March 25, 2018

श्री विधि द्वारा सरसों की खेती (Mustard cultivation by Shri Law)

श्री विधि द्वारा सरसों की खेती

श्री विधि से सरसों की खेती लघु एवं सीमान्त किसानों के लिए अत्यन्त उपयोगी है। क्योंकि वे कम जमीन में खेती करते हैं और कम जमीन से अधिक उत्पादन प्राप्त कर अधिक लाभ कमा सकते हैं।
   श्री विधि से सरसों की खेती क्या है।
    यह सरसों की खेती करने का एक तरीका है जिसमें श्री विधि के सिद्धान्तों का पालन करके अधिक उपज प्राप्त किया जाता है। जैसे:-
कम बीज दर: सिर्फ 50 ग्राम से 250 ग्राम प्रति एकड़।
बीज शोधन एवं बीज उपचार
उपचारित एवं अंकुरित बीज का उपयुक्त नर्सरी तैयार करना।
12 से 15 दिन के 3 से 4 पत्ती वाले पौध की रोपाई करना।
पौध से पौध एवं कतार से कतार की उपयुक्त दूरी रखना।
कम से कम दो-तीन बार खरपतवार की निकासी एवं कोनोवीडर/कुदाल से गुड़ाई।
फसल की देखभाल सामान्य सरसों की फसल की तरह ही की जाती है।
बीज एवं बीज का उपचार
    इस बीज के लिए किसी खास बीज की जरूरत नहीं है अपने क्षेत्र के लिए जो उन्नत बीज अनुशासित है उसी का प्रयोग करें। जो कि जिले के लिए उपयुक्त है।
बीज की मात्रा
   बीज की मात्रा फसल की अवधि पर निर्भर करती है। यदि अधिक दिनों की किश्म है तो बीज की मात्रा कम लगेगी तथा यदि कम दिनों की किस्म है तो बीज की मात्रा अधिक लगेगी।

क्र. फसल की अवधि (दिनों में) कतार से कतार एवं पौध से पौध की दूरी (से.मी. में) बीज दर (ग्राम प्रति एकड़)
1 100 दिन से कम 30 X 30 250 ग्राम
2 100 से 120 दिन 30 X 30 200 ग्राम
3 120 से 130 दिन 30 X 30 125 ग्राम
4 130 से 150 दिन 30 X 30  75 ग्राम
बीज का शोधन एवं बीज का उपचार:
    सबसे पहले बीज के हिसाब से दो गुना गुनगुना पानी लें, बीज को गुनगुने पानी में डालकर हल्के एवं ऊपर तैर रहे बीजों को बाहर कर दें। बीज में 2 ग्राम बाविस्टीन अथवा कार्बेण्डाजिम दवाई मिलाकर सूती कपड़ा में बॉधकर/पोटली बनाकर अंकुरित होने के लिए 10 से 12 घण्टा के लिए रख दें। स्थानीय मौसम के हिसाब से समय कम अधिक लग सकता है। अंकुरित बीज को नर्सरी में 2 ग् 2 ईंच की दूरी पर आधा ईंच गहराई में डाल दें।
नर्सरी की तैयारी:
    नर्सरी हेतु सब्जी वाले खेत का चुनाव करें। फसल की उम्र के हिसाब से नर्सरी हेतु नर्सरी बेड का छोटा बड़ा निर्माण करें। जैसे-कम दिन वाले किस्मों के लिए अधिक क्षेत्रफल एवं अधिक दिन वाले किस्मों के लिए कम क्षेत्रफल में नर्सरी बेड बनाया जाना चाहिए। नर्सरी बेड का क्षेत्रफल निम्नलिखित प्रकार से रखा जा सकता है:-
क्र. फसल की अवधि (दिनों में) नर्सरी बेड का क्षेत्रफल (वर्ग मीटर में)
1 100 दिन से कम 60 वर्ग मीटर
2 100 से 120 दिन 50 वर्ग मीटर
3 120 से 130 दिन 30 वर्ग मीटर
4 130 से 150 दिन 20 वर्ग मीटर

     जिस खेत में नर्सरी का बेड तैयार किया जा रहा हो उस खेत में नर्सरी के क्षेत्रफल के प्रति वर्ग मीटर में 2 से 2.5 किग्रा वर्मी कम्पोस्ट, 2 से 2.5 ग्राम कार्बोफ्यूरान (फ्यूराडान) मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिला लें।
नर्सरी बेड की चौडाई 1 मीटर तथा लम्बाई सुविधिनुसार रखें। यह ध्यान रखें कि नर्सरी बेड जमीन से 4 से 6 ईंच ऊचां हो।
दो बेड (पलियों) के बीच एक फीट की नाली बनायें।
नर्सरी में बीज की बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है।
अंकुरित बीज को 2 ईंच कतार से कतार तथा 2 ईंच बीज से बीज की दूरी पर तथा आधा ईंच की गहराई पर डालकर ढक दें।
नर्सरी बेड को बीज की बुआई उपरान्त वर्मी कम्पोस्ट एवं पुआल से ढक दें।
सुबह एवं शाम झारी (हजारे) से नियमित सिंचाई करें।
12 से 15 दिन में रोपाई हेतु पौध तैयार हो जाती है।
खेत की तैयारी:
   जिस खेत में श्री विधि से सरसों की रोपाई करनी हो उस खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। यदि खेत सूखा है तो सिंचाई (पलेवा सिंचाई) करके जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लें तथा खरपतवार को हॉथ से ही निकालकर खेत से बाहर कर दें।
सरसों की फसल की अवधि के हिसाब से उचित अंतराल पर ;कतार से कतार तथा पौध से पौधद्ध 6 ईंच चौड़ा तथा 8 से 10 ईंच गहरा गड्ढा कर लें। इसे 2 से 3 दिनों के लिए छोंड़ दें।
1 एकड़ खेत हेतु 50 से 60 क्विंटल कम्पोस्ट खाद में 4 से 5 किग्रा ट्राइकोडर्मा, 27 किग्रा डी.ए.पी. एवं 13.5 किग्रा म्यूरेट ऑफ पोटाष को अच्छी तरह मिला दें। तथा प्रत्येक गडढे में बराबर मात्रा में इस खाद को डाल कर 1 दिन के लिए पुनः खेत को छोंड़ दें।
डीएपी के स्थान पर तत्व के अनुपात में सुपर फास्फेट एवं यूरिया अथवा नत्रजन युक्त खाद का भी उपयोग किया जा सकता है।
श्री विधि से सरसों की रोपाई:
रोपाई के दो घंटे पूर्व नर्सरी में नमी बनाकर रख लें।
सावधानीपूर्वक मिट्टी सहित पौध को नर्सरी बेड से निकालें।
नर्सरी से पौध निकालते समय यह ध्यान रखें कि पौध को खुरपा या कुदाल की सहायता से कम से कम 1 से 2 ईंच मिट्टी सहित नर्सरी से निकालें।
पौध को नर्सरी से निकालने के आधा घण्टे के अंदर गड्ढे में रोपाई कर दें।
रोपाई पूर्व यह सुनिश्चित् कर लें कि प्रत्येक गड्ढे में सिंचाई किया हुआ हो।
पौध को प्रत्येक गड्ढे में सावधानीपूर्वक मिट्टी सहित लगा दें। ध्यान रखें कि रोपाई ज्यादा गहराई में न हो।
रोपाई के उपरान्त 3 से 5 दिन तक खेत में नमी बनाकर रखें। ताकि पौधा खेत में अच्छी तरह से लग जावे।
जहां मिट्टी भारी हो वहां सूखी रोपाई गोभी के समान करें तथा रोपाई के तत्काल बाद जीवन रक्षक सिंचाई करें।
फसल की देख रेख:
रोपाई के 15 से 20 दिन के अंदर पहली सिंचाई की जानी चाहिए। सिंचाई के 3 से 4 दिन बाद जब खेत में चलने लायक हो जाय तब 3 से 4 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट में 13.5 किग्रा यूरिया मिला कर जड़ों के समीप दे कर कुदाल/खुरपा अथवा वीडर चला दें।
दूसरी सिंचाई सामान्यतया पहली सिंचाई के 15 से 20 दिन बाद करते हैं। सिंचाई पश्चात् रोटरीवीडर/कोनोवीडर अथवा कुदाल से खेत की गुड़ाई आवश्यक है। आवश्यकतानुसार पौधें पर हल्की मिट्टी भी चढ़ा दें।
फसल की देख रेख:
रोपाई के 35 दिन बाद आवश्यकतानुसार तीसरी सिंचाई करें। सिंचाई के 3 से 4 दिन पश्चात् जब खेत में चलने लायक हो जाय तब 13.5 किग्रा यूरिया एवं 13.5 किग्रा पोटास को वर्मी कम्पोस्ट में मिला कर जड़ो के समीप डाल कर वीडर या कुदाल से अच्छी प्रकार मिट्टी हल्का कर जड़ों के ऊपर मिट्टी चढ़ा दें।
मिट्टी नहीं चढ़ाने से पौधों के गिरने का डर रहता है एवं मिट्टी चढ़ाने से पौधों के फैलाव करने में मद्द मिलती है। जिस प्रकार आलू की फसल में मिट्टी चढ़ाते हैं ठीक उसी प्रकार से कतार से कतार 1 फीट ऊंचा तक श्री विधि से सरसों की खेती में भी मिट्टी चढ़ाना आवश्यक है।
फसल की देख रेख:
इस समय पौधे काफी तेजी से बढ़ते हैं एवं पूरा खेत फसल की शाखाओं से ढक जाता है शाखा एवं पत्ते मोटे एवं चौड़े हो जाते हैं इनके अधिक बढ़वार के लिए 60, 80, 100 एवं 120 दिनों पर अगली सिंचाई की जानी चाहिए। यह समय मौसम एवं मिट्टी के प्रकार पर भी निर्भर करता है।
ध्यान देने की बात यह है कि पौधों के ऊपर माहो (लाही) एवं अन्य कीट का भी प्रकोप हो सकता है इससे बचने के लिए उचित प्रबंधन की आवश्यकता पड़ती है।
पौधों में फूल आने लगते हैं। फूल आने एवं फलियों में दाना भरने के समय पानी की कमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा उपज में काफी कमी हो जाएगी।
सामान्य विधि एवं श्री विधि में अंतर:
प्रति एकड़ सामान्य विधि एवं श्री विधि में अंतर
विवरण सामान्य विधि श्री विधि
बीज की मात्रा 2 से 3 किग्रा 75 ग्राम से 250 ग्राम
बीज शोधन एवं बीज उपचार नहीं किया जाता है गुनगुना पानी, गौमूत्र, गुड़ एवं वर्मी कम्पोस्ट के साथ बीज शोधन, ट्राइकोडर्मा तथा वाविस्टीन से बीज उपचार
बुआई एवं रोपाई छींटकर बोते हैं नर्सरी उगाकर छोटे पौधे को जैविक वातावरण में गड्ढे में रोपाते हैं
पौध से पौध एवं कतार से कतार की दूरी  अनियमित बुआई 30X30 सेमी से 75X75 सेमी तक
बीज का अंकुरण बुआई के एक सप्ताह बाद अंकुरित बीज का नर्सरी उगाया जाता है
निदाई-गुड़ाई नहीं किया जाता है दो से तीन बार वीडर या कुदाल से करते हैं
सिंचाई 2 से 3 बार 5 से 6 बार
मुख्य शाखाओं की संख्या 1 से 3 18 से 20
पत्ता पतला कम क्षेत्रफल वाला चौंड़ा अधिक क्षेत्रफल वाला
तना पतला मोटा
जड़ सतही 1 फीट तक गहरी
उपज 4 से 5 क्विंटल 15 से 20 क्विंटल
दानों का वजन प्रति पौधा 10 से 25 ग्राम 150 से 400 ग्राम
रोग एवं कीट प्रबंधन
1. कीट प्रबंधन:-
(क) सरसों का माहो (लाही) इस कीट के निम्फ एवं वयस्क दोनो ही नाजुक पत्तों, कली एवं फलियों से रस चूसते हैं। सरसों की रोपाई माह अक्टूबर में करने से नुकसान कम होता है। कीट का प्रकोप ज्यादा होने पर एमीडा क्लोप्रिड (कानफीडोर) अथवा थायमेथाक्सेम 50 से 60 ग्राम दवा प्रति एकड़ के हिसाब से 400 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।
(ख) डायमण्ड बैक मॉथ (तेली) इस कीट के पिल्लू पत्ता, तना एवं फलियों के हरे भाग को खाकर उसे सफेद एवं कागजी बना देता है। कीट की प्रारंभिक अवस्था में नीम के उत्पाद एजाडिराक्टिन 300 पीपीएम 1 लीटर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें। कीट के अधिक प्रकोप होने पर फिप्रोनील (रीजेंट) 5 एससी या ट्रायजोफॉस (होस्टाथियान) 40 ईसी 400 मिली लीटर या फ्लूफेनाक्सिरान (कास्केड) 10 WDC दवा का 120 मिली लीटर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें। 
2. रोग प्रबंधन:-
(क) क्लब रूट:- रोग ग्रस्त पौधे बौने रह जाते हैं पौधे मध्यम हरा से पीले होकर समय से पूर्व मौत हो जाती है। फसल के बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा से खेत का उपचार करें।
(ख) डाउनी मिल्ड्यू:- पत्ते के निचले भाग पर मध्यम उजले रंग के पाउडरनुमा धब्बे विकसित होते हैं। बीमारी के शुरूआत में मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से 10 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार छिड़काव करें। मेटालक्सिल (रीडोमिल र्ड) दवा का खड़ी फसल पर रोपाई के 45 दिनों पर 2.5 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करें। पोटास के प्रयोग से रोग कम हो जाता है।

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