Wednesday, December 27, 2017

गन्ने की उन्नत फसल (Advanced crop of sugarcane)

गन्ने की उन्नत फसल

ईंख की व्यावसायिक खेती गुड़ बनाने एवं इसका रस पीने के लिए की जाती हैं। ईंख एक नकदी फसल है, इसे एक वर्ष रोपकर दो खूँटी फसल के साथ लगातार तीन वर्षों तक उपज लिया जा सकता है। झारखण्ड राज्य के करीब 500 हेक्टेयर में गन्ना की खेती होती है। प्रमुख जिलों जैसे राँची, गुमला, गोड्डा, गढ़वा, कोडरमा, लोहरदगा आदि में इसकी खेती ज्यादातर की जाती है।

गन्ने की उन्नतशील जातियां

शीघ्र (9 से 10 माह) में पकने वाली वाली

किस्म : उपज क्विं. प्रति एकड़ : शक्कर मात्रा %

विवरण
अनुमोदित
को. 7314 : 320-360 : 21
कीट प्रकोप कम । रेडराट निरोधक/गुड़ व जड़ी के लिए उत्तम/संपूर्ण

मध्‍यप्रदेश(भारत)
को. 64 : 320-360 : 21
कीटों का प्रकोप अधिक, गुड़ व जड़ी के लिए उत्तम,

उत्तरी क्षेत्र
को.सी. 671 : 320-360 : 22
रेडराट निरोधक /कीट प्रकोप कम/ गुड़ व जड़ी के लिए उत्तम

उत्तरी क्षेत्र
को. 8209 : 360-400 : 20
कीट प्रकोप कम / लाल सड़न व कडुवा निरोधक/शक्कर अधिक/जड़ी उत्तम
को. 7704, को. 87008, को. 87010 : 320-360 : 20

कीट प्रकोप कम/लाल सड़न व कडुवा निरोधक/शक्कर अधिक/जड़ी उत्तम

उज्जैन संभाग
को. जवाहर 86-141, का. जवाहर 86-572 : 360-400 : 21
कम कीट प्रकोप/रेडराट व कंडवा निरोधक /गुड़ हेतु उपयुक्त जड़ी उत्तम/

संपूर्ण मध्‍यप्रदेश(भारत) 
का. जवाहर 86-572 
 मध्य से देर से (12-14 माह) में पकने वाली
 किस्म : उपज क्विं. प्रति एकड़ : शक्कर मात्रा %

विवरण
अनुमोदित 
को. 6304 : 380-400 : 19
कीट प्रकोप कम, रेडराट व कंडुवा निरोधक, अधिक उपज जड़ी मध्यम

सम्पूर्ण मध्‍यप्रदेश
को.7318 : 400-440 : 18
कीट कम, रेंडराट व कंडुवा निरोधक/ नरम, मधुशाला के लिए उपयोगी

उज्जैन सम्भाग
को. 6217 : 360-400 : 19 
कीट प्रक्षेत्र कम/ रेडराट व कंडुवा निरोधक / नरम, मधुशाला के लिए उपयोगी

उज्जैन संभाग 
को. जवाहर 94-141, को.जवाहर 86-2087 : 400-600 : 20
कीट प्रकोप कम/रेडराट व कंडवा निरोधक/ गुड़ व जड़ी के लिए उत्तम

मध्‍यप्रदेश, महाकौशल, छत्तीसगढ़ व रीवा संभाग
का. जवाहर 86-600 : 400-600 : 22.2
कीट प्रकोप कम/रेडराट व कडुवा निरोधक/ गुड़ व जड़ी के लिए उत्तम
मध्‍यप्रदेश


उत्तर प्रदेश(भारत) के विभिन्न जनपदों हेतु स्वीकृत गन्ना प्रजातियों की तालिका

जनपद

शीघ्र पकने वाली प्रजातियॉ

मध्य देर से पकने वाली प्रजातियॉ

प्रदेश के समस्त  गन्ना उत्पादक जनपद -

को०शा० 8436‚ को०शा० 88230‚ को०शा० 95255‚
को०शा०96268‚ को०शा० 03234‚
यू०पी० 05125 को०से० 98231
को०शा० 08272
को०से० 95422
को० 0238‚ को० 0118‚ को० 98014

को०शा० 767‚ को०शा० 8432‚को०शा० 97264‚  को०शा० 96275‚ को०शा० 97261‚ को०शा० 98259‚ को०शा० 99259‚ को०से० 01434‚ यू०पी० 0097‚ को०शा० 08279‚ को०शा० 08276‚ को०शा० 12232‚को०से० 11453‚ को० 05011

मेरठ, गाजियाबाद, हापुड़, बुलन्दशहर बागपत।
सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली

सभी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियों के साथ-साथ -
: को०जा 64‚ को०शा० 03251‚ को०लख० 9709‚ को० 0237‚ को० 0239‚ को० 05009‚ को०पी०के० 05191

सभी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियों के साथ-साथ -: :
: को०शा० 94257‚ को०शा० 96269‚ यू०पी० 39‚ को०पन्त० 84212‚  को०शा० 07250‚ को०ह० 119‚ को०पन्त 97222‚ को०जे० 20193‚ को० 0124‚ को०ह० 128

लखनऊ लखीमपुर, सीतापुर, हरदोई रायबरेली, कानपुर कानपुर-देहात फर्रखाबाद, उन्नाव, बरेली, पीलीभीत शाहजहॉपुर, बदॉयू अलीगढ़, एटा मथुरा, मुरादाबाद, सम्भल अमरोहा, रामपुर तथा बिजनौर।

सभी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियों के साथ-साथ -
: को०जा 64‚ को०से० 01235‚ को०लख० 9709‚ को० 0237‚ को० 0239‚ को० 05009‚ को०पी०के० 05191

सभी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियों के साथ-साथ -
: को०शा० 94257‚ को०शा० 96269‚ यू०पी० 39‚ को०पन्त० 84212‚ को०ह० 119‚ को०पन्त 97222‚ को०जे० 20193‚ को० 0124‚ को०ह० 128

देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़, मऊ, बलिया।
गोरखपुर, महराजगंज, बस्ती,सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर, गोण्डा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच।
फैजाबाद, बाराणसी भदोही, जौनपुर गाजीपुर, बाराबंकी अम्बेडकरनगर सुल्तानपुर, अमेठी इलाहाबाद, मिर्जापुर आदि

सभी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियों के साथ-साथ -
:को०से० 01235‚ को० 87263‚ को० 87268‚ को० 89029‚ को०लख० 94184‚ को० 0232‚ को०से० 01421

सभी क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियों के साथ-साथ -
: को०से० 96436‚ को० 0233‚ को०से० 08452

सभी जलप्लावित क्षेत्रों के लिए स्वीकृत प्रजातियॉ।  

यू०पी० -
: 9530 एवं को०से० 96436


खेत की तैयारी
       गन्ने के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। ग्रीष्म में मिट्टी पलटने वाले हल से दो बार आड़ी व खड़ी जुताई करें। अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह जुताई कर मिट्टी भुरभुरी कर लें तथा पाटा चलाकर समतल कर लें। रिजर की सहायता से 3 फुट की दूरी पर नालियां बना लें। परंतु बसंत ऋतु में लगाये जाने वाले (फरवरी-मार्च) गन्ने के लिए नालियों का अंतर 2 फुट रखें। अंतिम बखरनी के समय भूमि को लिंडेन 2% पूर्ण 10 किलो प्रति एकड़ से उपचारित अवश्य करें।
       बोने का समय गन्ने की अधिक पैदावार लेने के लिए सर्वोत्तम समय अक्टूबर - नवम्बर है । बसंत कालीन गन्ना फरवरी-मार्च में लगाना चाहिए।


बिजाई 
बीज की मात्रा एवं बोने की विधि
       गन्ने के लिए 100-125 क्वि. बीज या लगभग 1 लाख 25 हजार आंखें/हेक्टर गन्ने के छोटे-छोटे टुकडे इस तरह कर लें कि प्रत्येक टुकड़े में दो या तीन आंखें हों । इन टुकड़ों को कार्बेंन्डाजिम-2 ग्राम प्रति लीटर के घोल में 15 से 20 मिनट तक डुबाकर कर रखें। इसके बाद टुकड़ों को नालियों में रखकर मिट्टी से ढंक दें एवं सिंचाई कर दें या सिंचाई करके हलके से नालियों में टुकड़ों को दबा दें ।

अन्तवर्तीय फसल
       अक्टूबर-नवंबर में 90 से.मी. पर निकाली गई गरेड़ों में गन्ने की फसल बोई जाती है । साथ ही मेढ़ों के दोनों ओर प्याज, लहसुन, आलू राजमा या सीधी बढ़ने वाली मटर अन्तवर्तीय फसल के रूप में लगाना उपयुक्त होता है । इससे गन्ने की फसल को कोई हानि नहीं होती । इससे 6000 से 10000 रूपये का अतिरिक्त लाभ होगा। वसंत ऋतु में गरेडों की मेड़ों के दोनों ओर मूंग, उड़द लगाना लाभप्रद है । इससे 2000 से 2800 रूपये प्रति एकड़ अतिरिक्त लाभ मिल जाता है। उर्वरक गन्ने में 300 कि. नाइट्रोजन (650 किलो यूरिया), 80 किलो सल्फर, (500 कि0 सुपरफास्फेट) एवं 90 किलो पोटाश (150 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश) प्रति हेक्टर देवें।सल्फर व पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के पूर्व गरेडों में देना चाहिए। नाइट्रोजन की मात्रा अक्टू. में बोई जाने वाली फसल के लिए संभागों में बांटकर अंकुरण के समय, कल्ले निकलते समय हल्की मिट्टी चढ़ाते समय एवं भारी मिट्टी चढ़ाते समय दें फरवरी में बोई गई फसल में तीन बराबर भागों में अंकुरण के समय हल्की मिट्टी चढ़ाते समय एवं भारी मिट्टी चढ़ाते समय दें । गन्ने की फसल में नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति गोबर की खाद या हरी खाद से करना लाभदायक होता है।


सिंचाई, खाद एवम अन्य देखभाल 
गन्ने की खेती का मल्टीप्लायर के साथ नियोजन. 
       रासायनिक खादों के इस्तेमाल के कारण, सभी फसलों का एकरी उत्पादन कम हो गया है, परंतु गन्ने की फसल में, उत्पादन बहुत ज़्यादा कम हो गया हैजिस खेत में पिछले कई वर्षों से गन्ना लगाया जा रहा है, वहाँ का उत्पादन घटकर एकड़ में ३० से ४० टन तक रह गया है.  
       मल्टीप्लायर के इस्तेमाल से की जानेवाली गन्ने की खेती मेंपहले वर्ष ही गन्ने का एकरी उत्पादन ५० % तक बढ़ता है, और बढ़ते बढ़ते ७ वर्षों में २४० टन तक पहुँचता है, गन्ने की खेती में आज मिल रहा उत्पादन व मल्टीप्लायर के साथ होनेवाली खेती में मिलने वाला उत्पादन, दोनों की तफावत देखने के बाद यह निश्चित हो जाता है, कि गन्ने की खेती अगर करना है, तो मल्टीप्लायर के साथ ही करना फायदे की होगी.

बीज प्रक्रिया.
        अगर आप गन्ने के टुकड़े बीज के रूप में लगा रहे हो तब १० लीटर पानी में ५० ग्राम मल्टीप्लायर डालकर उस घोल में गन्ने के टुकड़े डुबाकर लगाएँ, या गन्ने के ढेर पर ऊपर से डालकर गन्नों को गीला करें, पानी की मात्रा आवश्यकतानुसार रखें.
        अगर आपने पौधे लगाए हों तब पौधे लगाते ही २०० लीटर पानी में २०० ग्राम मल्टीप्लायर मिलाकर १०० ग्राम घोल प्रत्येक पौधे के रूट झोन में डालियेगन्ने के टुकड़े लगाए हों या पौधे आपको हर महीना १ किलो मल्टीप्लायर जमीन से देना है, देने का तरीका अलग से बताया गया है. 
        गन्ने की फसल जब तक छोटी है, छिड़काव किया जा सकता है, तब तक १५ लीटर पानी में मल्टीप्लायर १५ ग्राम + २ मिली ऑल क्लियर मिलाकर ८ दिन के अंतर से छिड़काव करें.
        रासायनिक खाद एकदम से बंद नहीं करना है, उसका प्रमाण २० प्रतिसत कम करिये, जब आपको उत्पादन बढ़कर मिले, तब अगली फसल में रासायनिक खाद और कम करिये, कुछ सालों में आपका रासायनिक खाद शून्य हो जायेगा.

मल्टीप्लायर का कमाल.

        जहाँ भी गन्ने की खेती होती हैउस खेत की मिट्टी दूसरे किसी भी खेत की अपेक्षा ज़्यादा खराब होती हैइसीलिए गन्ने की फसल को पोषण का सबसे ज़्यादा प्रॉब्लेम आता हैगन्ने का अच्छा उत्पादन लेने के लिए कम से कम २५ से ४० कल्ले (फुटवे ) आने चाहिएपरन्तु बहुत सारे कल्ले (फुटवे ) छोटे रह जाने के कारण उत्पादन में भारी कमी आती हैमल्टीप्लायर फसल के पोषण की पूरी व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित करता हैइसीलिए जितने भी कल्ले ( फुटवे )आते हैंसब के सब गन्ने में परिवर्तित होते हैं.
        जिस खेत में लगातार गन्ने की फसल ली जा रही है, वहां लोकरी मावा जैसे कुछ प्रॉब्लेम आने लगे हैंजहां भी मल्टीप्लायर का इस्तेमाल होगा, वहां लोकरी मावा जैसे किटकों का प्रॉब्लेम नही आएगा, क्योंकि जब फसल का कुपोषण होता है, तभी फसल पर कीड़ और रोग आते हैंमल्टीप्लायर आपकी फसल को आवश्यकता से अधिक पोषण देता है, इसीलिए बलवान फसल पर  कीड़ और रोग नहीं आते.
        फसल अपनी आवश्यकता का ९६.२ % भोजन सूर्य प्रकाश , हवा और पानी से बनाती हैमल्टीप्लायर का इस्तेमाल होने के बादफसल के पत्तों का आकार डेढ़ गुना हो जाता हैपत्तों का रंग डार्क ग्रीन बन  जाता है, इसीलिए सूर्य प्रकाश की मदद से आपकी फसल पर ज़्यादा से ज़्यादा भोजन तैयार होता है, जो बढ़े हुए उत्पादन के स्वरुप में मिलता है.
        मल्टीप्लायर का इस्तेमाल करने के बाद फसल लगातार बढ़ती रहती हैप्रत्येक १० दिन में एक नया पत्ता आता हैतथा जुने पत्ते भी कार्यरत रहकर ज्यादा समय तक भोजन बनाते रहते हैंदूसरी एक महत्वपूर्ण बात आपको देखने को मिलेगीकी गन्ने की गिल्ली जिसे पेरा भी कहते हैका साइज भी पहले की अपेक्षा ५० % से ज़्यादा लंबा आता है, तथा गन्ने की मोटाई भी बढ़ती है,   इन सभी कारणों से उत्पादन में बढ़त आती है.
        जिस खेत में मल्टीप्लायर का इस्तेमाल होता है, उस खेत के गन्ने पानी के अभाव में सूखते या मरते नहीं हैकई बार गर्मी में पानी की कमी हो जाती है, ऐसे में गन्ने की फसल जल जाती हैकिसान भाई को बड़ी रक्कम खर्च करके फिर से गन्ने की फसल लगाना पड़ती है, कई किसान भाइयों के खेतों में यह देखने में आया है कि, गर्मी में पानी की कमी होने पर, अड़ोस पड़ोस के खेतों में गन्ने की फसल जल गयी है, परन्तु जिस खेत में मल्टीप्लायर का इस्तेमाल किया गया था, उसका मामूली नुकसान दिखा, और जैसे ही बरसात आईपूरा खेत हरा भरा हो गयापानी के अभाव में जो  ग्रोथ रुकी हुई थीउसकी भी पूर्ती हो गयीयह कमाल है मल्टीप्लायर का.

महत्वपूर्ण सूचना.
        गन्ने की फसल में सिलिका घटक ज़्यादा मात्रा में लगता हैआज हमारी मिट्टी खराब होने के कारण सिलिका  के अभाव में फसल की ग्रोथ कम हो रही है, इसीलिए पहले ही दिन से अच्छी  ग्रोथ  लेने के लिए, मल्टीप्लायर के साथ हमारी मदर कम्पनी का उत्पादन ऑल क्लियर देना  ज़रूरी है, पूरी फसल के कार्यकाल में २ बार २५० मिली ऑल क्लियर जमीन से पानी के साथ देना है.
        गन्ने की फसलमें आपको ट्रायकोडर्मा ट्रीटमेंट करना जरुरी है, गन्ने की खेती में रासायनिक खादों का इस्तेमाल ज्यादा होने से मिटटी कड़क हो गई है,इसलिए हानिकारक विषाणु की मात्रा बढ़ गई है, आप कंपनी के बताए अनुसार ट्रायकोडर्मा घर पर बनाकर जब फसल को पानी देंगे उसके साथ देना है, ऐसा आप तीन महीने तक लगातार करें, ऐसा करने से मिटटी से सभी हानिकारक विषाणु समाप्त हो जायेंगे, ट्रायकोडर्मा ट्रीटमेंट का ५ एकड़ का खर्च २५० रुपये आता है.
        गन्ने की खेती में रासायनिक खादों का इस्तेमाल ज्यादा होता है, इसलिए मिटटी का पी.एच. ६.८ से ज्यादा हो गया है, इसलिए एकड़ में ३ किलो सल्फर ( पानी में घुलनशील ) पानी के साथ एक समय में १ किलो की मात्रा में ३ बार दें.

नराई-गुड़ाई
        बोनी के लगभग 4 माह तक खरपतवारों की रोकथाम आवश्यक होती है। इसके लिए 3-4 बार नराई करनी चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के लिए अट्राजिन 160 ग्राम प्रति एकड़ 325 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण के पूर्व छिड़काव करें। बाद में ऊगे खरपतवारों के लिए 2-4 डी सोडियम साल्ट 400 ग्राम प्रति एकड़ 325 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें। छिड़काव के समय खेत में नमी होना आवश्यक है। मिट्टी चढ़ाना गन्ने को गिरने से बचाने के लिए रीजर की सहायता से मिट्टी चढ़ाना चाहिए। अक्टूबर - नवम्बर में बोई गई फसल में प्रथम मिट्टी फरवरी - मार्च में तथा अंतिम मिट्टी मई माह में चढ़ाना चाहिए। कल्ले फूटने के पहले मिट्टी नहीं चढ़ाना चाहिए।

सिंचाई
        शीतकाल में 15 दिन के अंतर पर एवं गर्मी में 8-10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। सिंचाई सर्पाकार विधि से करें। सिंचाई की मात्रा कम करने के लिए गरेड़ों में गन्ने की सूखी पत्तियों की 4-6 मोटी बिछावन बिछायें। गर्मी में पानी की मात्रा कम होने पर एक गरेड़ छोड़कर सिंचाई करें।

बंधाई
        गन्ना न गिरे इसके लिए कतारों के गन्ने की झुंडी को गन्ने की सूखी पत्तियों से बांधना चाहिए। यह कार्य अगस्त के अंत में या सितम्बर माह में करना चाहिए।

पौध संरक्षण
        गन्ने की फसल को रोग व कीटों से बचाने के लिए निम्नानुसार पौध संरक्षण उपाय करें

कीट/रोग

1. अग्र तना छेदक (काईलो इन्फसकेटेलस) इल्ली जमीन की सतह के पास से मुलायम तने में छेदकर अंदर खाते हुये ऊपर की ओर सुरंग बनाती है, जिससे पोई सूख जाती है । विकसित इल्ली 20-25 मि.मी. लंबी रंग मटमैला सिर काला ऊपर बैंगनी रंग की पांच धारियां। फोरेट-10 क्र या कार्बोफ्यूरान 3क्र दानेदार दवा जड़ों के पास ड़ालें। फोरेट-10 क्र 600 ग्राम या 400 ग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति एकड़ का उपयोग करें।

2. शीर्ष तना छेदक सिरकोफेगा एक्सरप्टालिस पत्तियों की मध्य शिराओं में छेदक काटती है, बाद में तन में सुरंग बनाकर नुकसान करती है । इल्ली 25-30 मि.मी. की सफेद मलाई रंग की होती है। कार्बोफ्यूरान 3 जी दानेदार दवा 400 ग्राम प्रति एकड़ से जड़ों के पास ड़ाले।

3. जड़ छेदक (इमेलोसेराडिप्रेसेललो) कीट की इल्ली 30 मि.मी. रंग सफेद सिर पीला भूरा भूमिगत हिस्सों को खाती है । जमीन के पास तने में छेदकर नीचे की ओर सुरंग बनाती है। पौधा सूख जाता है।

4. इल्ली 30 एम.एम. सफेद रंग सिर पीला भूरा  फोरेट-10 जी 400 ग्राम या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी-400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से जड़ों के पास ड़ालें।

5. पायरिलला (पायरिलला परपुलला) कीट पत्तियों का रस चूसते हैं। पत्तियां पीली पड़ जाती हैं। भूरे पीले रंग के होते हैं। शिशु उपांग को एवं वयस्क नुकीली चोंच व तिकोनी संरचना वाले होते हैं। मेलाथियान 50 ई.सी. का 0.05% या मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. का 0.04% का स्प्रे करें। जैविक नियंत्रण हेतु जब 3-5 अंडे शिशु प्रौढ़ प्रति पत्ती हो तो एपीरिकेनियां केजी वित ककून 1600-2000 ककून या 1.6-2.0 लाख अंडे प्रति एकड़ की दर से छोड़ें।

6. रेडरॉट कालेटोट्राइकम फालकेटम पौधों की ऊपरी पत्तियां किनारों से पीली पड़ सूखने लगती हैं। गन्ना सुकड़ जाता है। वजन, रस व शक्कर की मात्रा कम हो जाती है। तने को लंबवत चीरने से गूदा लाल रंग का हो जाता है लाल रंक के ऊतकों में कुछ अंतर पर सफेद आड़ी पट्टियों का होना रोग की मुख्य पहचान है। स्वस्थ बीज बोयें

      बीजोपचार द्वारा गर्म हवा यंत्र में गन्ने के टुकड़ों को 50 सेंटीग्रेड पर 4 घंटे तक रखें। बाद में ठंडा होने पर फफूंद नाशक दवा से उपचारित करें।

      कंडुवा(स्मट) (अस्टिलेगो सिटामिनी) गन्ना पतला,हल्का कम रस वाला हो जाता है पौधे घास की तरह दिखते हैं। आरंभ में पहचान कठिन है। बाद में पत्तियों के मध्य में लंबी घूमी हुई काली डंडी निकलती है। प्रारंभ में डंडी चमकदार झिल्ली से ढंकी रहती है, जिसके फटने पर विषाणु हवा द्वारा स्वस्थ पौधों पर फैलते हैं। दवा द्वारा बोने के पूर्व गन्ने के बीज को एगेलाल 0.5 1 कि.ग्रा. 200 ली. पानी में 5 मिनट डुबोकर रखें । निरोधक जांतिया बोयें रोग में पेडी न ले।

रोगग्रस्त खेत का पानी स्वस्थ फसल में न आने दें । फसल चक्र अपनायें
         गन्ने की पेडी अधिक लाभकारी कृषक गन्ने की पेड़ी फसल पर विशेष ध्यान नहीं देते, फलस्वरूप इसकी उपज कम प्राप्त होती है। यदि पेड़ी फसल में भी योजनाबद्ध तरीके से कृषि कार्य किये जायें तो इसकी उपज भी मुख्य फसल के बराबर प्राप्त की जा सकती है। पेड़ी फसल से अधिक उपज लेने के लिए अनुशंसित कृषि माला अपनानी चाहिए। मुख्य गन्ना फसल के बाद बीज टुकड़ों से ही पुन: पौधे विकसित होते हैं जिससे दूसरे वर्ष फसल प्राप्त होती है। इसी प्रकार तीसरे साल भी फसल ली जा सकती है। इसके बाद पेड़ी फसल लेना लाभप्रद नहीं होता। यहां यह उल्लेखनीय है कि रोग कीट रहित मुख्य फसल से ही भविष्य की पेड़ी फसल से अधिक उपज ली जा सकती है। चूंकि पेड़ी फसल बिना बीज की व्यवस्था तथा बिना विशेष खेत की तैयारी के ही प्राप्त होती है, इसलिए इसमें लागत कम लगती है। साथ ही पेड़ी की फसल मुख्य फसल अपेक्षा जल्द पक कर तैयार हो जाती है। इसके गन्ने के रस में मिठास भी अधिक होती है।
     किस्में यदि कृषक नया बीज लगा रहे हैं तथा आगे पेड़ी रखने का कार्यक्रम हो तो को. 1305 को. 7314, को.7318 , को. 775, को. 1148,को. 1307, को. 1287 आदि अच्छी पेड़ी फसल देने वाली किस्मों का स्वस्थ व उपचारित बीज लगाएं खेत की सफाई जीवांश खाद बनाने के लिए पिछली फसल की पत्तियों व अवशेषों को कम्पोस्ट गड्डे में डालें। कटी सतह पर उपचार कटे हुए ठूंठों पर कार्बेन्डाइजिम 550 ग्राम 250 ली. पानी में घोल कर झारे की सहायता से कटे हुए सतह पर छिड़कें इससे कीटव्याधि संक्रमण से बचाव होगा। खाली जगह भरना खेत में खाली स्थान का रहना ही कम पैदावार का कारण हैं। अत: जो जगह 1 फुट से अधिक खाली हो वहां नये गन्ने के उपचारित टुकड़े लगाकर सिंचाई कर दें। गरेड़ों को तोड़े सिंचाई के बाद बतर आने पर गरेड़ों के बाजू से हल चलाकर तोड़े जिससे पुरानी जड़ें टूटेंगी तथा नई जड़े दी गई खाद का पूरा उपयोग करेंगी। पर्याप्त खाद दें बीज फसल की तरह ही जड़ फसल में भी नाइट्रोजन 120 कि., सल्फर 32 कि. तथा पोटाश 24 कि. प्रति एकड़ दर से देना चाहिए। सल्फर एवं पोटाश की पूरा मात्रा एवं नाइट्रोजन की अधिक मात्रा गरेड़ तोडते समय हल की सहायता से नाली में देना चाहिए। शेष आधी नाइट्रोजन की मात्रा आखिरी मिट्टी चढ़ाते समय दें। नाली में खाद देने के बाद रिजर या देसी हल में पाटा बांधकर हल्की मिट्टी चढ़ायें। सूखी पत्तियां बिछायें प्राय: किसान सूखी पत्तियों को खेत में जला देते हैं। उक्त सूखी पत्तियों को जलाये नहीं बल्कि उन्हे गरड़ों में बिछा दें। इससे पानी की भाप बनकर उड़ने में कमी होगी। सूखी पत्तियां बिछाने के बाद 10 कि.ग्रा. बी.एच.सी 10% चूर्ण प्रति एकड़ का भुरकाव करें । अन्य कार्य जब पौधे 1.5 मी. ऊंचाई के हो जाएं तब गन्ना बंधाई का कार्य करें। समन्वित नींदा नियंत्रण एवं पौधे संरक्षण उपाय करें। उपरोक्त कम खर्च वाले उपाय करने से जड़ी फसल की पैदावार भी बीज फसल की पैदावार के बराबर ली जा सकती है।

कटाई 
      मुख्य फसल की कटाई मुख्य फसल को फरवरी-मार्च में काटें फरवरी पूर्व कटाई करने से कम तापमान होने के कारण फुटाव कम होगा तथा पेड़ी फसल में कल्ले कम प्राप्त होगी। कटाई करते समय गन्ने को जमीन की सतह के करीब से काटा जाना चाहिए। इससे स्वस्थ तथा अधिक कल्ले प्राप्त होंगे। ऊंचाई से काटने से ठूंठ पर कीट व्याधि की प्रारंभिक अवस्था में प्रकोप की संभावना बढ़ जाती हैं तथा जड़ें भी ऊपर से निकलती हैं, जो कि बाद मैं गन्ने के वजन को नहीं संभाल पाती।





No comments:

Post a Comment